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असली सोना-मोती, इत्र और 10 साल की मेहनत, के. आसिफ ने ‘मुगल-ए-आजम’ पर पानी की तरह बहाया था पैसा

भारतीय सिनेमा की सबसे आइकॉनिक फिल्मों में से एक ‘मुगल-ए-आज़म’ आज भी अपनी भव्यता और भव्य प्रोडक्शन के लिए जानी जाती है. साल 1960 में रिलीज हुई इस फिल्म को उस दौर की सबसे महंगी फिल्म माना गया है. इस फिल्म का बजट करीब 1.5 करोड़ रुपये था, जो आज के हिसाब से लगभग 145 करोड़ रुपये के बराबर है. जब ये फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हुई तो इसने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया.

डायरेक्टर के. आसिफ ने फिल्म पर लगाया खूब पैसा
‘मुगल-ए-आज़म’ के डायरेक्टर के. आसिफ ने लगभग एक दशक की मेहनत के बाद 1960 में इस फिल्म को बनाया. उन्होंने अपने इस प्रोजेक्ट से किसी तरह का समझौता नहीं किया. उन्होंने इस फिल्म पर पानी की तरह पैसा बहाया. फिल्म की शूटिंग बेहद भव्य और डिटेल्ड तरीके से की गई थी. इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, आसिफ ने रियल गोल्ड आइडल, असली मोती और इत्र से भरे पूल का इस्तेमाल किया था, ताकि हर सीन असली और शाही दिखे. यहां तक कि ‘शीश महल’ सीन के लिए बेल्जियन ग्लास मंगवाया गया, जिसकी कीमत भी लाखों में थी. 

दिलीप कुमार और निर्देशक के. आसिफ नहीं करते थे बातचीत
खास बात ये रही कि ये फिल्म एक दशक से भी ज्यादा समय तक बनती रही. इतने लंबे प्रोडक्शन पीरियड के दौरान कई तरह की समस्याएं और विवाद भी सामने आए. बताया जाता है कि फिल्म के मुख्य कलाकारों के बीच रिश्ते बिगड़ चुके थे. यहां तक कि दिलीप कुमार और निर्देशक के. आसिफ के बीच बातचीत भी बंद हो गई थी. इसके साथ ही प्रोडक्शन लगातार देरी और बढ़ते खर्चों से जूझ रहा था. 

असली सोना-मोती, इत्र और 10 साल की मेहनत, के. आसिफ ने 'मुगल-ए-आजम' पर पानी की तरह बहाया था पैसा

ये भी पढ़ें:- Mughal-E-Azam: जब पूरी फिल्म के बजट में ‘मुगल-ए-आज़म’ का सिर्फ एक गाना शूट किया गया था

जब डायेक्टर ने रोक दी शूटिंग
इन तमाम मुश्किलों के बीच भी आसिफ अपने विजन को लेकर बेहद सख्त थे. वो किसी भी सीन में क्वालिटी और रियलिज्म को लेकर कोई समझौता करने के मूड में नहीं थे. उन्होंने एक बार शूटिंग रोक दी थी, क्योंकि जोधा बाई के मंदिर वाले सीन में असली सोने की मूर्ति का इस्तेमाल नहीं किया गया था. एक और सीन में जब सलीम के स्वागत के लिए असली मोतियों की जरूरत थी, तो उन्होंने नकली प्रॉप्स को तुरंत रिजेक्ट कर दिया. उस समय इन मोतियों की कीमत करीब 1 लाख रुपये थी, जो आज के हिसाब से लगभग 97 लाख रुपये के बराबर मानी जाती है.

फिल्म में असली इत्र का किया इस्तेमाल
के. आसिफ का परफेक्शन केवल ज्वैलरी या प्रॉप्स तक सीमित नहीं था. बताया जाता है कि एक सीन में अनारकली को इत्र से भरे कुंड से बाहर निकलते हुए दिखाना था. पहले जब प्रोडक्शन टीम ने इसे साधारण पानी से शूट करने की कोशिश की, तो निर्देशक ने इसे तुरंत खारिज कर दिया. उनका मानना था कि ये सीन तभी शानदार लगेगा जब उसमें असली इत्र का इस्तेमाल हो. इसके बाद ही शूटिंग आगे बढ़ी.

15 लाख रुपये का बेल्जियन कांच 
जब आसिफ फिल्म की शूटिंग कर रहे थे, तब टेक्नोलॉजी बहुत तेज़ी से बदल रही थी. उन्होंने फैसला किया कि सॉन्ग ‘प्यार किया तो डरना क्या’ को टेक्नीकलर में शूट किया जाएगा. ‘द हिंदू’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, ‘शीश महल’ वाले सीन को शूट करने के लिए 15 लाख रुपये (2026 में 14.5 करोड़ रुपये) का बेल्जियन कांच इम्पोर्ट किया गया था. जहां कई टेक्नीशियन सालों तक ये समझ नहीं पाए कि ये सीन आखिर कैसे शूट किया गया था. वहीं, डायरेक्टर के. आसिफ और सिनेमैटोग्राफर आर.डी. माथुर ने कैमरे की चमक को कम करने के लिए कपड़ों की पट्टियां लगाने का एक शानदार तरीका निकाला और गाने को  शूट किया.

प्रोड्यूसर ने आसिफ को दी चेतावनी
आसिफ ने 70 प्रतिशत हिस्सा शूट करने के बाद फैसला किया कि वो पूरी फिल्म टेक्नीकलर में शूट करना चाहते हैं, लेकिन तभी प्रोड्यूसर शापूरजी पालोनजी मिस्त्री ने आखिरकार सख्ती दिखाई. फिल्म अपने तय बजट से कहीं ज़्यादा खर्च कर चुकी थी और लगभग एक दशक से बन रही थी. वो अब और देरी बर्दाश्त नहीं कर सकते थे. प्रोड्यूसर ने आसिफ को धमकी दी कि अगर उन्होंने अब पूरी फिल्म को दोबारा बनाने के बारे में सोचा भी तो मौजूदा फिल्म डिस्ट्रीब्यूटरों को दे दी जाएगी और जैसी है वैसी ही रिलीज़ कर दी जाएगी. डिस्ट्रीब्यूटर भी लंबे समय से फिल्म का इंतज़ार कर रहे थे. 

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उस्ताद बड़े गुलाम अली खान को एक गाने के लिए दिए 25,000 रुपये 
सिर्फ़ कॉस्ट्यूम और प्रॉप्स ही नहीं, फिल्म के हर डिपार्टमेंट ने इस तरह पैसे खर्च किए जैसे उनके पास पैसे की कोई कमी ही न हो. 2004 के एक इंटरव्यू में फोटोग्राफ़र जयेश सेठ ने बताया कि उस्ताद बड़े गुलाम अली खान को एक गाने के लिए 25,000 रुपये दिए गए थे, जबकि लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी को प्रति गाना 200-300 रुपये मिले थे. 25,000 रुपये आज के हिसाब से लगभग 24 लाख रुपये के बराबर हैं.

बॉक्स ऑफिस पर हुई सुपरहिट
लंबे समय तक चलने वाली शूटिंग, बढ़ते खर्च और कई विवादों के बावजूद ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बड़ी हिट साबित हुई. बॉलीवुड हंगामा के अनुसार, ‘मुगल-ए-आज़म’ ने बॉक्स ऑफिस पर 3.5 करोड़ रुपये का कलेक्शन किया था, जो आज के हिसाब से लगभग 340 करोड़ रुपये के बराबर माना जाता है. ये उस दौर की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनकर उभरी. 

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‘मुगल-ए-आज़म’ के बाद नहीं बनाई कोई फिल्म
‘मुगल-ए-आज़म’ की आपार सफलता के बाद भी डायरेक्टर के. आसिफ का फिल्मी करियर ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाया. उन्होंने फिल्में बनाना छोड़ दिया था. डायरेक्टर ने साल 1963 में गुरु दत्त के साथ फिल्म ‘लव एंड गॉड’ बनाना शुरू किया था, लेकिन 1964 में दत्त के निधन के बाद उन्हें ये फिल्म बीच में ही रोकनी पड़ी. कुछ साल बाद उन्होंने संजीव कुमार के साथ इस फिल्म को फिर से शुरू किया, लेकिन फिल्म पूरी होने से पहले 1970 में आसिफ का निधन हो गया. आख़िरकार इस फिल्म को उनकी पत्नी ने पूरा किया और 1986 में संजीव कुमार के निधन के कुछ महीनों बाद इसे रिलीज किया गया.

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