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पूर्वांचल में सपा के PDA की काट के लिए BJP का PPP मॉडल, ऐसे लगाएंगे सेंध!

पूर्वांचल में सपा के PDA की काट के लिए BJP का PPP मॉडल, ऐसे लगाएंगे सेंध!

सपा के PDA की काट के लिए BJP का PPP मॉडल

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने समाजवादी पार्टी के PDA फॉर्मूले की काट तलाशनी शुरू कर दी है. लोकसभा चुनाव 2024 में सपा के PDA समीकरण ने जिस तरह चुनावी नतीजों को प्रभावित किया, उसके बाद बीजेपी अब पाल-पटेल-पासी यानी PPP मॉडल पर काम करती दिखाई दे रही है. इस रणनीति में बीजेपी सीधे फ्रंट पर आने के बजाय बिहार में अपने सहयोगी दलों जनता दल यूनाइटेड (JDU) और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को आगे कर रही है. पूर्वांचल में इन दलों की गतिविधियां इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही हैं.

एक नवंबर को JDU की जनसभा के बाद अब पांच नवंबर को लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) शक्ति प्रदर्शन करने जा रही है. केंद्रीय मंत्री और पार्टी अध्यक्ष चिराग पासवान इस रैली के जरिए उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने की तैयारी में हैं. इसके पहले JDU भी उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव लड़ने और NDA के घटक दल के रूप में उतरने की इच्छा जाहिर कर चुकी है.

दरअसल, लोकसभा चुनाव के नतीजों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरणों की अहमियत फिर से सामने रख दी. अयोध्या जैसी सीट पर बीजेपी अवधेश प्रसाद को रोक नहीं पाई. सपा ने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण के जरिए अलग-अलग सामाजिक समूहों को एक मंच पर लाने की कोशिश की. अब बीजेपी के सामने चुनौती है कि वह इन जातीय समूहों में अपनी पकड़ बनाए रखे और सपा के साथ उनके जुड़ाव को कमजोर करे.

JDU का दावा- संगठन तैयार, सीटों पर जल्द बनेगी सहमति

JDU के यूपी प्रभारी श्रवण कुमार का कहना है कि उत्तर प्रदेश में पार्टी के विस्तार का काम पूरा हो चुका है. वह पिछले कई महीनों से संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं. श्रवण कुमार के मुताबिक, जल्द ही बीजेपी के साथ सीटों को लेकर सहमति बन जाएगी. उनका कहना है कि JDU, NDA को और मजबूत करेगी और नीतीश मॉडल को लेकर चुनाव मैदान में उतरेगी.

सूत्रों के मुताबिक, JDU पूर्वांचल के प्रभावशाली कुर्मी नेताओं के संपर्क में है. पार्टी की कोशिश है कि कुर्मी समाज के बीच अपने संगठन और राजनीतिक प्रभाव को विस्तार दिया जाए. JDU की उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ने की तैयारी के पीछे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक पहचान और कुर्मी समाज के बीच उनकी स्वीकार्यता को भी एक आधार के तौर पर देखा जा रहा है.

JDU पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि वह 2027 के विधानसभा चुनाव में उन सीटों का आकलन कर रही है, जहां उसका प्रदर्शन बेहतर हो सकता है. पार्टी की ओर से NDA के साथ चुनाव लड़ने की संभावनाओं पर भी विचार किया जा रहा है. हालांकि, सीटों की संख्या और विधानसभा क्षेत्रों को लेकर अभी कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है.

LJP का दावा- मायावती के बाद चिराग पासवान दलित समाज के बड़े नेता

JDU के साथ ही लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) भी उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने में जुटी है. पार्टी के जमुई से सांसद और यूपी प्रभारी अरुण भारती ने TV9 डिजिटल से बातचीत में कहा कि बहन कुमारी मायावती के बाद चिराग पासवान दलित समाज के सबसे बड़े नेताओं में से एक हैं. उनका कहना है कि अगर लोकसभा चुनाव में LJP बीजेपी के साथ उत्तर प्रदेश में रहती तो NDA को इतनी सीटों का नुकसान नहीं उठाना पड़ता.

LJP ने पाल समाज के नेताओं को भी अपने संगठन से जोड़ने की पहल की है. अमरपाल को उत्तर प्रदेश LJP का महासचिव बनाया गया है. वहीं, बनारस में पिंटू पाल सहित कई जिलों की जिम्मेदारी पाल समाज के नेताओं को सौंपी गई है. पार्टी की कोशिश है कि दलित और पाल समाज के बीच संगठन का विस्तार किया जाए और स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली चेहरों को आगे लाया जाए.

पांच नवंबर को चिराग पासवान की प्रस्तावित रैली को इसी विस्तार अभियान के हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है. JDU की जनसभा के बाद LJP का शक्ति प्रदर्शन यह संकेत देता है कि बिहार के दोनों सहयोगी दल उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा रहे हैं.

PPP मॉडल से बीजेपी को क्यों है चुनौती?

PPP मॉडल यानी पाल-पटेल-पासी समीकरण की चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि इन तीनों सामाजिक समूहों की उत्तर प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में राजनीतिक मौजूदगी है. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक विजय नारायण के मुताबिक, पूर्वांचल के वाराणसी, मिर्जापुर, बस्ती और जौनपुर में पासी समाज की अच्छी संख्या है. प्रयागराज, प्रतापगढ़, मछलीशहर और कौशांबी में भी पासी समाज का ठीक-ठाक वोट बैंक है.

उनके मुताबिक, उत्तर प्रदेश में जाटव समाज के बाद पासी दलित आबादी के लिहाज से दूसरा बड़ा समूह है. वहीं, पाल समाज पूर्वांचल के अलावा ब्रज, रुहेलखंड और कानपुर-बुंदेलखंड तक फैला हुआ है. पटेल समाज की भी पूर्वांचल में कई सीटों पर प्रभावी मौजूदगी है. विजय नारायण के अनुसार, कुल मिलाकर पूर्वांचल की 100 से अधिक सीटों पर PPP मॉडल प्रभाव डाल सकता है.

बीजेपी के लिए चुनौती यह है कि लोकसभा चुनाव के दौरान इन सामाजिक समूहों का एक हिस्सा सपा के PDA फॉर्मूले के साथ जुड़ता दिखाई दिया. PDA में पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों को एक साथ लाने की कोशिश की गई. PPP के तीन सामाजिक समूहों के साथ जब यादव और मुस्लिम मतदाता भी जुड़ते हैं तो यह व्यापक PDA समीकरण बन जाता है. यही वजह है कि बीजेपी के सामने इन जातीय समूहों के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने की चुनौती है.

2016 में वाराणसी से शुरू हुआ था गैर यादव-गैर जाटव समीकरण

बीजेपी ने इससे पहले भी गैर यादव पिछड़े और गैर जाटव दलित समुदायों को एक साथ लाने की रणनीति पर काम किया था. 2016 में वाराणसी के सेवापुरी में अमित शाह की मौजूदगी में सामाजिक समरसता कार्यक्रम आयोजित किया गया था. इस कार्यक्रम के जरिए पाल, पटेल और पासी समाज के साथ राजभर, निषाद और मौर्य समुदाय को जोड़ने की कोशिश की गई थी.

गैर यादव-गैर जाटव समीकरण बीजेपी की उत्तर प्रदेश में सामाजिक और चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा रहा है. 2024 के लोकसभा चुनाव में संविधान और आरक्षण के मुद्दे के बीच सपा ने पाल, पटेल और पासी समाज के मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की. इसी समीकरण को अब बीजेपी के सामने चुनौती के रूप में देखा जा रहा है.

बिहार के सहयोगी बीजेपी को कैसे पहुंचाएंगे मदद?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी की मदद के लिए बिहार के सहयोगी दलों को आगे क्यों किया जा रहा है? वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र कुमार इसे बीजेपी की राजनीतिक रणनीति बताते हैं. TV9 डिजिटल से बातचीत में उन्होंने कहा कि बिहार के सहयोगियों के सहारे बीजेपी सपा-कांग्रेस गठबंधन के वोटों को प्रभावित करने की कोशिश कर सकती है.

राजेंद्र कुमार के मुताबिक, जिन विधानसभा क्षेत्रों में PPP यानी पाल-पटेल-पासी समीकरण प्रभावी है, वहां सहयोगी दलों की रणनीति का इस्तेमाल किया जा सकता है. इसके साथ ही बीजेपी को इन दलों के संगठन, संसाधनों और कार्यकर्ताओं की ताकत का भी लाभ मिल सकता है.

उनका मानना है कि बीजेपी के लिए सहयोगियों को उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में सीटें देना मुश्किल हो सकता है. ऐसे में एक संभावना यह है कि JDU और LJP उन नेताओं को अपने साथ जोड़ें, जिन्हें सपा-कांग्रेस गठबंधन में टिकट नहीं मिलता और जो चुनाव लड़ने के लिए दूसरा विकल्प तलाशते हैं. ऐसे नेताओं को टिकट देकर गठबंधन के वोटों में सेंध लगाने की कोशिश हो सकती है.

रणनीति कारगर होगी या उलटा पड़ सकता है दांव?

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक विजय नारायण इसे बीजेपी का एक रिस्की स्ट्रोक मानते हैं. उनके मुताबिक, बीजेपी ने जातीय समीकरणों को ध्यान में रखकर रणनीति बनाई है, लेकिन इसका चुनाव में कितना असर होगा, यह अभी तय नहीं है.

विजय नारायण का कहना है कि बीजेपी कमजोर सीटों की समीक्षा कर रही है. जिन सीटों पर पार्टी की स्थिति कमजोर है और जहां PPP मॉडल प्रभावी है, वहां बिहार के सहयोगियों के जरिए इस रणनीति को आजमाया जा सकता है, लेकिन इन जातियों को किसी राजनीतिक दल के प्रभाव में आसानी से लाया जा सकेगा, इसकी गारंटी नहीं है. उनके मुताबिक, पाल, पटेल और पासी समाज राजनीतिक रूप से जागरूक हैं और अपने हितों को समझते हैं. ऐसे में यह मान लेना कि वे किसी रणनीति के तहत आसानी से अपना समर्थन बदल देंगे, सही नहीं होगा.

अमित कुमार सिंह

अमित कुमार सिंह

पिछले 15 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय, 2008 सितम्बर में नई दुनियां अख़बार दिल्ली से पत्रकारिता शुरू की. अप्रैल 2009 में ज़ी मीडिया जॉइन किया. दिसंबर 2018 तक ज़ी मीडिया में बतौर ब्यूरो चीफ बनारस रहा. जनवरी 2019 से जनतंत्र टीवी में गए और 2021 तक जिम्मेदारी निभाई.

रोमिंग जर्नलिस्ट के तौर पर जनतंत्र टीवी के लिए स्पेशल करेस्पोंडेंट की हैसियत से दिल्ली, बिहार-झारखंड और लखनऊ में अपनी सेवाएं दीं. टीवी 9 यूपी का हिस्सा बनने से पहले न्यूज़ नेशन गोरखपुर में बतौर ब्यूरो चीफ़ की भूमिका में रहे. फिलहाल टीवी 9 यूपी (डिजिटल) के लिए बनारस से सेवाएं दे रहे हैं.

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