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बिजनौर में तेंदुए और बाघ क्यों हो रहे मोटे और गबरू? वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट ने बताई वजह

आम तौर पर तेंदुए का वजन 60 से 70 किलोग्राम होता है, लेकिन उत्तर प्रदेश के बिजनौर में वन विभाग द्वारा गांवों में लगाए गए पिंजरों में जो तेंदुए पकड़े जा रहे हैं, वे जंगल में रहने वाले तेंदुओं की तुलना में कहीं ज्यादा मोटे और हष्ट-पुष्ट हैं. इन तेंदुओं का वजन 100 किलो से लेकर 120 किलो तक निकल रहा है.

कहा जा रहा की ऐसे मोटे गबरू, हष्ट-पुष्ट तेंदुए वनों में नहीं पाए जाते हैं, क्योंकि जंगल में उन्हें शिकार करने के लिए लगातार दौड़-भाग करनी पड़ती है और खाने के लिए संघर्ष भी करना होता है. इन्हें हिरन, खरगोश, सुअर, नीलगाय, बंदर, लंगूर जैसे शिकार को पकड़ने के लिए आठ-दस बार दौड़ना पड़ता है. तब जाकर कहीं एक बार सफलता मिलती है.

एसीएफ ने क्या कहा?

वन विभाग के एसीएफ ज्ञान सिंह ने तेंदुओं के बढ़ते हुए वजन का कारण बताते हुए कहा कि, गांवों में जहां मरे हुए जानवर फेंके जाते हैं, उन जगहों के आसपास के खेतों में तेंदुए और बाघ रहते हैं. इसके अलावा यहां बछड़े, बछिया, कुत्ते और गीदड़ जैसे जानवर आसानी से उनका शिकार हो जाते हैं. क्योंकि वे तेजी से दौड़ नहीं पाते हैं.

यही वजह है कि तेंदुए इन इलाकों में ही रहते हैं, खाते हैं और अपना वंश बढ़ाते हैं. उन्हें मेहनत कम करनी पड़ती है और आसानी से भोजन मिल जाता है. यही कारण है कि इस इलाके में रहने वाले तेंदुओं का वजन तेजी से बढ रहा है.

क्या बोले विशेषज्ञ?

बिजनौर की ताजपुर स्टेट निवासी वाइल्ड लाइफ फाउंडेशन ऑफ इंडिया से जुड़े वन्यजीव विशेषज्ञ राजा इंद्रजीत सिंह ने बताय कि गन्ने के खेतों को तेंदुओं ने अपने रहने का स्थायी ठिकाना बना लिया है. वे पिछले चार-पांच साल से यहीं छिपे रहते हैं, यहीं उनके बच्चे पैदा हो रहे हैं, यहीं पल रहे हैं, और यहीं रह रहे हैं.

उन्होंने कभी जंगल देखा ही नहीं है. यहां आसानी से भोजन मिलने के कारण इनकी वंशवृद्धि हो रही है. मादा तेंदुआ साल में दो बार तीन से पांच बच्चे देती है और यहां सभी बच्चे जीवित रहते हैं, जबकि जंगलों में तेंदुए बाघों से संघर्ष में मर भी जाते हैं.

चलाया जा रहा जागरुकता अभियान

स्थिति को देखते हुए, बिजनौर रेंज के रेंजर महेश गौतम ने जानकारी दी है कि वन विभाग की आठ टीमें रात-दिन गुलदार बहुल गांवों में गश्त कर रही हैं. ये टीमें ग्रामीणों, खेतों में काम करने वाले किसान-मजदूरों और स्कूल पढ़ने जाने वाले बच्चों को गुलदारों से बचाव के टिप्स दे रही हैं और वन विभाग द्वारा जारी की गयी एडवाइजरी के पालन करने का सुझाव देते है.

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