उत्तर प्रदेशभारत

पान के पत्ते पर सीक्रेट मैसेज, बर्फी में तिरंगा…आजादी की जंग में जब बनारस के स्वाद से मात खा गई थी ब्रिटिश हुकूमत

पान के पत्ते पर सीक्रेट मैसेज, बर्फी में तिरंगा...आजादी की जंग में जब बनारस के स्वाद से मात खा गई थी ब्रिटिश हुकूमत

बनारस के पान और तिरंगी बर्फी ने आजादी की लड़ाई में अनोखा योगदान दिया था.

Independence Day Special: देश जब अपना स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारियों में जुटा है, तब आजादी के आंदोलन से जुड़ी कई ऐसी अनकही कहानियां सामने आ रही हैं जो हमें गौरवान्वित करती हैं. ऐसी ही एक बेहद दिलचस्प और अनूठी कहानी जुड़ी है बनारस के सांस्कृतिक प्रतीक ‘बनारसी पान’ और प्रसिद्ध ‘तिरंगी बर्फी’ से. अंग्रेजों के शासनकाल में जब तिरंगा फहराने और क्रांतिकारी गतिविधियों पर कड़ा पहरा था, तब काशी के लोगों ने विरोध और गुप्त संदेश भेजने के लिए पान और मिठाइयों का अनूठा जरिया बनाया था.

बनारस की सबसे पुरानी पान की दुकानों में से एक ‘नेताजी पान भंडार’ चलाने वाले राजेश चौरसिया बताते हैं कि ब्रिटिश राज के दौरान भारत छोड़ो आंदोलन के समय तिरंगे के प्रदर्शन पर कई जगह सख्त पाबंदियां थीं. उस समय चौक थाने के बगल में पान की दुकान चलाने वाले राम नारायण चौरसिया ने क्रांतिकारियों की मदद का एक नायाब तरीका निकाला.

राम नारायण जिस पत्ते में पान लगाकर क्रांतिकारियों को देते थे, उसके निचले हिस्से में चौक थाने की पुलिस हलचल और उनकी गतिविधियों से जुड़ी गोपनीय जानकारी लिखी होती थी. बनारस का चौक थाना उस दौर में बेहद महत्वपूर्ण था, जहां बड़ी संख्या में क्रांतिकारियों को कैद रखा जाता था. पान के जरिए पुलिस की हर महत्वपूर्ण मूवमेंट की सूचना बिना किसी शक के क्रांतिकारियों तक पहुंच जाती थी.

नेहरू, शास्त्री और इंदिरा गांधी भी थे इस दुकान के मुरीद

राम नारायण चौरसिया के खास दोस्तों में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री, पंडित कमलापति त्रिपाठी और रघुनाथ सिंह जैसे महान स्वतंत्रता सेनानी शामिल थे. ये दिग्गज नेता आजादी मिलने के बाद जब सांसद, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बने, तब भी इस दुकान पर आकर पान खाने का लुत्फ उठाते थे. इसके अलावा पंडित जवाहरलाल नेहरू, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और के. कामराज जैसे कद्दावर नेता भी इस ऐतिहासिक दुकान पर आ चुके हैं.

जब अंग्रेजों के बैन का तोड़ बनी ‘तिरंगी बर्फी’ और ‘जवाहर लड्डू’

इतिहासकार प्रोफेसर राजीव श्रीवास्तव के अनुसार, 1905 के आंदोलन, काकोरी कांड और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में बनारस की भूमिका काफी अहम थी. इस वजह से अंग्रेजों ने यहां झंडा फहराने पर बैन लगा दिया था. इसका तोड़ निकालने के लिए काशी के हलवाइयों ने राष्ट्रप्रेम व्यक्त करने का नया तरीका खोजा.

ये भी पढ़ें: एक जौ की रोटी और एक प्याला पानी कहानी सूफी अम्बा प्रसाद की, जिसकी कलम ने हिला दी थी ब्रिटिश हुकूमत

ठठेरी बाजार के मदन गोपाल गुप्ता और कचौड़ी गली के बचानू साव जैसे प्रसिद्ध हलवाइयों ने कई प्रयोगों के बाद ‘तिरंगी बर्फी’ की खोज की. ‘श्रीराम भंडार’ के अधिष्ठाता वरुण गुप्ता (मदन गोपाल गुप्ता की पांचवीं पीढ़ी) बताते हैं कि उनके परदादा ने बादाम, पिस्ता और केसर का उपयोग करके तीन रंगों वाली बर्फी तैयार की थी. इसके साथ ही उन्होंने जवाहर लड्डू, गांधी गौरव और वल्लभ संदेश जैसी मिठाइयां भी बनाईं, जो सीधे तौर पर अंग्रेजों को चुनौती देती थीं.

GI टैग मिलने के बाद बढ़ी मांग, आज भी बरकरार है क्रेज

वरुण गुप्ता ने बताया कि तिरंगी बर्फी को जीआई (GI) टैग मिलने के बाद इसकी लोकप्रियता में जबरदस्त उछाल आया है. आज भी 15 अगस्त और 26 जनवरी के मौके पर इसकी मांग काफी बढ़ जाती है. जहां पहले यह बर्फी बादाम और पिस्ता से बनती थी, वहीं अब इसे काजू और मावा से तैयार किया जाता है. आज बाजार में तिरंगी बर्फी 600 रुपये प्रति किलो और जवाहर लड्डू 1000 रुपये प्रति किलो के भाव से बिक रहा है.

अमित कुमार सिंह

अमित कुमार सिंह

पिछले 15 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय, 2008 सितम्बर में नई दुनियां अख़बार दिल्ली से पत्रकारिता शुरू की. अप्रैल 2009 में ज़ी मीडिया जॉइन किया. दिसंबर 2018 तक ज़ी मीडिया में बतौर ब्यूरो चीफ बनारस रहा. जनवरी 2019 से जनतंत्र टीवी में गए और 2021 तक जिम्मेदारी निभाई.

रोमिंग जर्नलिस्ट के तौर पर जनतंत्र टीवी के लिए स्पेशल करेस्पोंडेंट की हैसियत से दिल्ली, बिहार-झारखंड और लखनऊ में अपनी सेवाएं दीं. टीवी 9 यूपी का हिस्सा बनने से पहले न्यूज़ नेशन गोरखपुर में बतौर ब्यूरो चीफ़ की भूमिका में रहे. फिलहाल टीवी 9 यूपी (डिजिटल) के लिए बनारस से सेवाएं दे रहे हैं.

Read More

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button