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गोरखपुर का ऐसा सिद्ध पीठ, जहां दी जाती थी अंग्रेजों की बलि; जानें इस मंदिर की खासियत

गोरखपुर का ऐसा सिद्ध पीठ, जहां दी जाती थी अंग्रेजों की बलि; जानें इस मंदिर की खासियत

गोरखपुर जिला मुख्यालय से 22 किलोमीटर की दूरी पर एक ऐसा सिद्ध पीठ है, जहां पर एक वीर शहीद ने अंग्रेजों की बलि दी थी. देवरिया रोड पर स्थित यह सिद्ध पीठ तरकुलहा देवी के नाम से प्रसिद्ध. यहां मां तरकुलहा देवी का भव्य मंदिर ना है. मां तरकुलहा देवी की कहानी अमर बलिदानी बाबू बंधू सिंह से जुड़ी है. शहीद बंधू सिंह आजादी के उस दौर में अंग्रेजों का सिर काट कर माता की सिद्ध पीठ पर चढ़ाते थे. पकड़े जाने पर अंग्रेजों ने बंधु सिंह को फांसी दी थी. मां तरकुलहा देवी का दर्शन करने के लिए यूपी ही नहीं बल्कि देश भर से श्रद्धालु यहां आते हैं. नवरात्र में यहां काफी भीड़ रहती है. चैत्र नवरात्र के बाद यहां मेला लगता है. दूर-दूर से लोग मेले में आते हैं. मां का दर्शन करने के बाद लोग मेले का भी आनंद लेते हैं.

अमर बलिदानी बाबू बंधू सिंह का नाम देशभक्ति में पूरे सम्मान के साथ लिया जाता है. स्वाधीनता की लड़ाई में बंधू सिंह ने अंग्रेजों के नाक में दम कर दिया था. मां तरकुलहा देवी की कहानी कम लोगों को ही पता होती है कि उन्हें सिद्ध पीठ के रूप में पहचान दिलाने वाले कौन थे, लेकिन चौरी-चौरा करीब में होने की वजह से ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ पर श्रद्धालुओं को यह जानकारी दी जा रही है. डुमरी रियासत के बाबू शिव प्रताप सिंह के पुत्र अमर बलिदानी बाबू बंधू सिंह का नाम उन देशभक्तों में पूरे सम्मान के साथ लिया जाता है, जो स्वाधीनता की पहली ही लड़ाई में अंग्रेजों के लिए नासूर बन गए थे.

घने जंगलों में ही रहते थे बाबू बंधू सिंह

बाबू बंधू सिंह का आतंक इतना था कि अंग्रेज उनके नाम से कांपते थे. बाबू बंधू सिंह ने आजादी की लड़ाई के लिए अपना राज पाठ कुर्बान कर दिया था. बंधू सिंह तरकुलहा सिद्ध पीठ के पास घने जंगलों में ही रहते थे. इस सिद्ध पीठ की प्रसिद्धि की कहानी डुमरी रियासत के बाबू शिव प्रताप के पुत्र बाबू बंधू सिंह से जुड़ी हुई है. बंधू सिंह घने जंगलों में ही रहकर अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंके थे. बंधु सिंह जंगल में रहकर मां तरकुलहा की पूजा करते थे और अंग्रेजों का सिर काटकर मां के सिद्ध पीठ पर चढ़ाते थे.

धोखे से बाबू बंधू सिंह को किया गिरफ्तार

बंधू सिंह ने गुरिल्ला युद्ध प्रणाली अपनाकर अंग्रेजों के नाक में दम कर दिया था. उनकी इस प्रणाली और अपने अफसरों को खोने से भयभीत अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार करने के लिए हर कोशिश कर डाली थी. अपने मुखबिरों का जाल भी बिछा दिया था. काफी प्रयास के बाद अंग्रेज उन्हें धोखे से गिरफ्तार करने में सफल हो गए, जिसके बाद अंग्रेजों ने बंधु सिंह को फांसी की सजा दी. बताया जाता है कि अंग्रेज जब बंधू सिंह को फांसी दे रहे तो बार-बार फांसी का फंदा टूट जाता था. बार-बार वह बंधू सिंह को फांसी पर चढ़ाते थे और फांसी टूट जाती थी. काफी प्रयास के बाद भी अंग्रेज उन्हें फांसी देने में असफल रहे.

7 फंदे फांसी पर लटकाया, हर बार टूट गया फंदा

सात बार प्रयास करने के बाद जब अंग्रेज असफल हो गए तो अंत में स्वयं बंधु सिंह ने मां तरकुलहा देवी से अपने चरणों में लेने का अनुरोध किया. उसके बाद जब उनके गले में फांसी का फंदा डाला गया तो वह हंसते-हंसते उस पर झूल गए. तब जाकर अंग्रेजों के सांस में सांस आई. बंधु सिंह को गोरखपुर के कोतवाली थाना क्षेत्र के अलीनगर (आर्य नगर) में फांसी दी गई थी.

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