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Trump Peace Plan: ‘गाजा के बाद कहीं कश्मीर…’, इसलिए बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने से झिझक रहा भारत? ट्रंप पर शक

गाजा को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने पर भारत ने अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है. सरकार के भीतर इस पहल के राजनीतिक, कूटनीतिक और रणनीतिक पहलुओं पर गहन विचार चल रहा है. मामले से परिचित सूत्रों के अनुसार, यह प्रस्ताव कई संवेदनशील मुद्दों से जुड़ा है, इसलिए किसी भी अंतिम फैसले पर पहुंचने से पहले सावधानी बरती जा रही है.

भारतीय अधिकारियों ने यह स्वीकार किया है कि भारत को इस वैश्विक पहल में शामिल होने का औपचारिक निमंत्रण मिला है. हालांकि, यह भी स्पष्ट किया गया है कि निमंत्रण मिलना और उसमें शामिल होना दो अलग-अलग बातें हैं. भारत की विदेश नीति लंबे समय से संतुलन और रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है, जिसे ध्यान में रखते हुए ही इस प्रस्ताव की समीक्षा की जा रही है.

क्या है भारत का रुख?

सूत्रों के अनुसार, भारत का पारंपरिक रुख अब भी वही है कि इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष का स्थायी समाधान केवल दो-राष्ट्र सिद्धांत के जरिए ही संभव है. भारत ऐसे हर प्रयास का समर्थन करता है जो क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता की दिशा में ईमानदारी से आगे बढ़े, लेकिन किसी भी बहुपक्षीय मंच में शामिल होने से पहले उसके दीर्घकालिक प्रभावों को परखना जरूरी माना जा रहा है. डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में करीब 60 देशों के नेताओं को पत्र भेजकर इस ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की परिकल्पना साझा की है.

भारतीय पक्ष की प्रमुख चिंता

भारतीय पक्ष की प्रमुख चिंता यह है कि प्रस्तावित बोर्ड का दायरा भविष्य में गाजा से आगे बढ़ सकता है. आशंका जताई जा रही है कि किसी स्तर पर यह मंच कश्मीर जैसे संवेदनशील और आंतरिक मुद्दों को भी चर्चा के दायरे में ला सकता है, जो भारत के लिए स्वीकार्य नहीं होगा. इस संदर्भ में ट्रंप के उन पुराने दावों को भी याद किया जा रहा है, जिनमें उन्होंने मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए सीमित सैन्य संघर्ष को खत्म कराने में मध्यस्थता का श्रेय लिया था. भारत ने तब साफ किया था कि संघर्ष विराम दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच सीधी बातचीत का नतीजा था न कि किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता का.

फ्रांस का सतर्क रुख

भारत की तरह फ्रांस भी इस प्रस्ताव को लेकर सतर्क रुख अपनाए हुए है. फ्रांसीसी राष्ट्रपति कार्यालय से जुड़े सूत्रों ने संकेत दिया है कि पेरिस फिलहाल इस बोर्ड में शामिल होने के पक्ष में नहीं है. फ्रांस अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर इस पहल के कानूनी ढांचे और संयुक्त राष्ट्र प्रणाली पर पड़ने वाले असर का आकलन कर रहा है. फ्रांसीसी पक्ष का मानना है कि प्रस्तावित चार्टर केवल गाजा तक सीमित नहीं है और यह संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा सिद्धांतों और बहुपक्षीय व्यवस्था से टकराव पैदा कर सकता है. 

बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण मिलने की पुष्टि

यूरोपीय संघ, रूस, बेलारूस और थाईलैंड जैसे देशों ने इस बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण मिलने की पुष्टि की है. वहीं कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा है कि उन्होंने इस प्रस्ताव को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार कर लिया है, हालांकि अंतिम शर्तें अभी तय होना बाकी हैं. बताया जा रहा है कि यह बोर्ड गाजा में इजरायल और हमास के बीच हुए युद्धविराम समझौते के दूसरे चरण से जुड़ा हुआ है.

 कार्यकारी समिति के गठन की घोषणा

व्हाइट हाउस ने इस योजना को लागू करने के लिए एक कार्यकारी समिति के गठन की घोषणा भी की है. इस समिति में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, मध्य पूर्व के लिए अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, जेरेड कुश्नर और विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा जैसे नाम शामिल हैं.

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