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काम शुरू करने से पहले शटर बंद! सपा का IPAC को टाटा, UP में अब कौन पार लगाएगा नैया?

काम शुरू करने से पहले शटर बंद! सपा का IPAC को टाटा, UP में अब कौन पार लगाएगा नैया?

I-PAC से सपा का कॉन्ट्रैक्ट खत्म

पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों का असर उत्तर प्रदेश में दिखने लगा है. बीजेपी की जीत ने न सिर्फ ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल कर दिया है, बल्कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को झटका दिया है. यूपी में विधानसभा चुनाव का ऐलान दिसंबर में हो सकता है. उससे पहले अखिलेश ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है. सपा ने IPAC के साथ अपना नाता तोड़ लिया है और दूसरी एजेंसी को काम सौंपा है. आपको इस नई एजेंसी के बारे में भी बताएंगे और ये भी बताएंगे कि IPAC से सपा का नाता टूटने की कहानी क्या है?

दरअसल, अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के लिए 2027 का विधानसभा चुनाव ‘करो या मरो’ जैसा है. इस चुनाव में जीत के लिए सपा ने मशहूर चुनावी रणनीतिकार संस्था Indian Political Action Committee (IPAC) को सर्वे और सोशल मीडिया का काम दिया था. IPAC ने ही 2021 में तमिलनाडु में डीएमके और पश्चिम बंगाल में टीएमसी की जीत की रणनीति बनाई थी. बताया जाता है कि ममता बनर्जी के कहने पर अखिलेश ने IPAC को काम दिया था, लेकिन दोनों प्रदेशों में हार के बाद अखिलेश ने कॉन्ट्रैक्ट खत्म करने का फैसला कर लिया है.

ED की वजह से टूटा IPAC से नाता?

अखिलेश यादव से जुड़ सूत्रों का कहना है कि पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रबंधन और डेटा रणनीति को लेकर उठे सवालों ने सपा नेतृत्व को सतर्क कर दिया. इसी का असर यह हुआ कि अखिलेश यादव ने चुनावी सलाहकार कंपनियों के साथ अपने रिश्तों की समीक्षा शुरू कर दी. सपा और IPAC के बीच करार टूटने के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं. सबसे बड़ा कारण प्रवर्तन निदेशालय यानी ED की कार्रवाई मानी जा रही है. बंगाल चुनाव के दौरान IPAC से जुड़े मामलों में ED की जांच और छापों ने सपा नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी थी. यूपी में चुनाव के दौरान सपा कोई रिस्क नहीं लेना चाहती है.

ढाई महीने पहले ही IPAC को दिया गया था काम

सूत्रों के मुताबिक, सपा को यह आशंका थी कि चुनावी रणनीति से जुड़े संवेदनशील दस्तावेज और डेटा कहीं लीक न हो जाएं. यही वजह रही कि अखिलेश यादव ने जोखिम लेने के बजाय समय रहते कॉन्ट्रैक्ट खत्म करना बेहतर समझा. इसके अलावा यह भी कहा जा रहा है कि IPAC की टीम का बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश के बाहर से काम कर रहा था, जिससे स्थानीय राजनीतिक समझ और जमीनी पकड़ को लेकर भी सवाल उठ रहे थे. दिलचस्प बात यह है कि सपा ने महज ढाई महीने पहले ही IPAC और एक अन्य कंपनी ‘शो टाइम’ को चुनावी जिम्मेदारी सौंपी थी.

IPAC के जिम्मे क्या काम था?

IPAC को खास तौर पर उन सीटों पर फोकस करने का काम दिया गया था, जहां पिछली बार सपा बहुत कम अंतर से हार गई थी. इन सीटों को ‘माइक्रो टारगेटिंग’ के जरिए जीत में बदलने की रणनीति बनाई जा रही थी. वहीं ‘शो टाइम’ को सोशल मीडिया और प्रचार अभियान की जिम्मेदारी दी गई थी. अब जबकि IPAC को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है, ‘शो टाइम’ अपना काम जारी रखेगी. समाजवादी पार्टी ने कभी भी ऑफिशियल तौर पर IPAC और ShowTime को लेकर कोई बयान नहीं जारी किया है, न ही उनके जुड़ने या उनके कॉन्ट्रैक्ट के खत्म करने पर भी बयान आया है.

अब कौन संभालेगा चुनावी मोर्चा?

IPAC के बाहर होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि अब सपा की चुनावी नैया कौन पार लगाएगा? फिलहाल पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि सपा अब ज्यादा भरोसा अपनी ‘इन-हाउस’ टीम और स्थानीय नेताओं पर करेगी. इसके अलावा, चुनावी सर्वे और सोशल मीडिया के लिए अलग-अलग छोटी टीमों को जिम्मेदारी दी जा सकती है. ‘शो टाइम’ के पास पहले से ही डिजिटल और प्रचार की जिम्मेदारी है, इसलिए उसका रोल और बढ़ सकता है. सपा अब बाहरी रणनीतिकारों के बजाय अपने संगठन और स्थानीय नेतृत्व पर ज्यादा भरोसा करना चाहती है.

पंकज चतुर्वेदी

पंकज चतुर्वेदी

पंकज चतुर्वेदी पिछले 11 साल से देश और उत्तरप्रदेश की राजनीति को कवर करते आ रहे हैं. दिल्ली में अमर उजाला और पंजाब केसरी से पत्रकारिता की यात्रा की शुरुवात हुई.

दिल्ली में 2 साल की पत्रकारिता के बाद मिट्टी की खुशबू यूपी खींच लाई और तब से राजधानी लखनऊ में ही पत्रकारिता हो रही है. 2017 में यात्रा को विस्तार देते हुए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े. राजनीतिक खबरों में गहरी रुचि और अदंर की खबर को बाहर लाने का हुनर के साथ ही यूपी के ब्यूरोकेसी में खास पकड़ रखते हैं.

इनकी पत्रकारिता का फलसफा खबरों को खबर के रूप में ही आप तक पहुंचाना है.

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