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पाकिस्तान में हिन्दुओं की अनदेखी बना बड़ा मुद्दा, विधानसभा में उठी आवाज, मंत्री की अजीब सफाई

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में अल्पसंख्यक समुदायों की उपेक्षा को लेकर राजनीतिक विवाद गहरा गया है. पंजाब प्रांत की विधानसभा में विधायकों ने सरकार पर आरोप लगाया कि 2025-26 के बजट में चर्चों और मंदिरों के संरक्षण के लिए कोई फंड आवंटित नहीं किया गया, जबकि अल्पसंख्यक बहुल इलाकों के विकास के लिए भी पर्याप्त राशि नहीं रखी गई.

सत्तारूढ़ Pakistan Muslim League-Nawaz (PML-N) के सीनेटर बाबा फाल्बस क्रिस्टोफर ने विधानसभा सत्र के दौरान कहा कि पंजाब में चर्चों और मंदिरों की मरम्मत व संरक्षण के लिए “एक भी पैसा” नहीं दिया गया. सत्तारूढ़ पार्टी के अल्पसंख्यक सीनेटर ने आरोप लगाया कि ईसाई बहुल बस्तियों के विकास के लिए भी लगभग कोई बजट नहीं रखा गया. क्रिस्टोफर ने सरकार से मांग की कि 2026-27 के बजट में अल्पसंख्यक समुदायों के धार्मिक स्थलों और बुनियादी सुविधाओं के लिए पर्याप्त फंड आवंटित किया जाए.

हिंदुओं के लिए कोई ठोस कल्याणकारी योजना नहीं है: बसरो
वहीं Pakistan Peoples Party (PPP) के हिंदू विधायक बसरो जी ने कहा कि दक्षिण पंजाब में बड़ी संख्या में हिंदू आबादी रहती है, लेकिन उनके लिए कोई ठोस कल्याणकारी योजना शुरू नहीं की गई. उन्होंने आरोप लगाया कि हिंदू इलाकों के विकास के लिए जो सीमित फंड रखा गया था, उसे भी बाद में वापस ले लिया गया.

बहस के दौरान पंजाब विधानसभा के स्पीकर मलिक मुहम्मद अहमद खान ने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के कामकाज पर भी सवाल उठाए. यह मंत्रालय पाकिस्तान के पहले सिख मंत्री रमेश सिंह अरोरा के पास है. स्पीकर ने कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय आज भी पीने के पानी, सफाई और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं, इसलिए विकास निधि पहले इन जरूरतों पर खर्च होनी चाहिए.

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अल्पसंख्यकों की समस्याएं 1947 से चली आ रही है: अरोड़ा
हालांकि मंत्री रमेश सिंह अरोड़ा ने सरकार का बचाव करते हुए कहा कि अल्पसंख्यकों की समस्याएं 1947 से चली आ रही हैं और उन्हें “रातोंरात” खत्म नहीं किया जा सकता. उन्होंने दावा किया कि मुख्यमंत्री मरियम नवाज की सरकार ने पिछले दो वर्षों में अल्पसंख्यक मामलों के विभाग का बजट 300 प्रतिशत तक बढ़ाया है.

मानवाधिकार संगठन माइनॉरिटी राइट्स के अनुसार पाकिस्तान में ईसाई, हिंदू, अहमदी, सिख और कलाश जैसे अल्पसंख्यक समुदाय अक्सर गरीबी, भेदभाव और असुरक्षा के माहौल में जीवन बिताते हैं. संगठन का कहना है कि देश की लगभग चार प्रतिशत आबादी होने के बावजूद इन समुदायों को अक्सर “दूसरे दर्जे के नागरिक” जैसा व्यवहार झेलना पड़ता है.

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