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Labor Day Special: मजदूर की मेहनत का गुणगान, करते हैं वेद और पुराण


<p style="text-align: justify;"><strong>Labour Day: </strong>जिसके हाथों में छाले हैं, उसी के दम से महलों के उजाले हैं. अदम गोंडवी की ये लाइन मजदूर दिवस पर उन तमाम मजदूरों पर सटीक बैठती हैं जो अपनी मेहनत से किसी भी राष्ट्र की तकदीर और तस्वीर दोनों संवारते हैं,</p>
<p style="text-align: justify;">1 मई को पूरी दुनिया मजदूर दिवस के रूप में मनाती है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि श्रमिकों का महत्व केवल आधुनिक विचारधारा तक सीमित नहीं है. हिंदू धर्म, जिसकी जड़ें हजारों वर्षों पुरानी हैं, उसने श्रमिक वर्ग को समाज की आत्मा माना है. वेदों, पुराणों और धर्मशास्त्रों में मजदूरों के सम्मान, अधिकार और सामाजिक कर्तव्यों को लेकर विशेष जोर देते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वेदों में श्रम की महिमा</strong><br />ऋग्वेद, सबसे प्राचीन ग्रंथ, मानवता को कर्मशीलता का संदेश देता है. <strong><em>’कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’,</em> </strong>सभी को श्रेष्ठ बनाओ (ऋग्वेद 9.63.5). यह संदेश श्रम की सार्वभौमिकता को स्थापित करता है. वेदों में कर्म को जन्म से नहीं, कर्म की गुणवत्ता से जोड़ा गया है. अथर्ववेद में कृषक, कारीगर, व्यापारी और सेवा-प्रदाता वर्गों का सम्मानपूर्वक वर्णन मिलता है. वेदों का संदेश साफ है, कोई भी कार्य तुच्छ नहीं होता.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>धर्मशास्त्रों में श्रमिकों के अधिकार</strong><br />मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति जैसे ग्रंथ श्रमिकों के प्रति समाज और नियोक्ता के कर्तव्यों को स्पष्ट रूप से स्थापित करते हैं. मनु के अनुसार <strong><em>’नात्यर्थं कारयेत्तं तु'</em></strong> यानि श्रमिक से उसकी क्षमता से अधिक कार्य नहीं करवाना चाहिए.</p>
<p style="text-align: justify;">शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि मजदूरी का समय पर भुगतान करना केवल दया नहीं, धर्म है. नारद स्मृति के अनुसार, यदि कोई मालिक श्रमिक को उचित पारिश्रमिक नहीं देता, तो वह पाप का भागी होता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रामायण और महाभारत में मजदूर</strong><br />रामायण में भगवान राम द्वारा केवट, निषादराज गुह, और शबरी से किया गया व्यवहार, यह दर्शाता है कि श्रम करने वाला, सेवा देने वाला, समाज का पूजनीय अंग है. महाभारत में विदुर नीति कहती है कि ‘जो राजा श्रमिकों और किसानों का आदर करता है, वही राज्य को समृद्ध करता है.’ यह विचार लोकतंत्र के लिए भी प्रासंगिक है, जो राज्य श्रमिकों के लिए कल्याणकारी योजना बनाता है, वो राज्य उन्नति करता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>गीता का संदेश</strong><br />श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: <strong><em>’नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः'</em></strong> इसका अर्थ है कि अपने नियत कर्म को करो, कर्म निष्क्रियता से श्रेष्ठ है. यह उपदेश इस बात का भी प्रमाण है कि कर्म ही धर्म है, और कर्मशील व्यक्ति किसी भी युग में पूजनीय होता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>मजदूर दिवस पर सनातन का संदेश</strong><br />पूरा देश मजदूर दिवस मना रहा है, तो यह समझना भी आवश्यक है कि हिंदू धर्म में श्रमिकों को केवल सहानुभूति नहीं, सम्मान मिला है. वे समाज के रथ के पहिए हैं, और बिना उनके श्रम के कोई सभ्यता आगे नहीं बढ़ सकती.</p>
<p style="text-align: justify;">श्रम ही शिव है, सेवा ही सनातन है. वेदों से लेकर गीता तक, हर ग्रंथ यही सिखाता है कि श्रम करना केवल पेट पालने का माध्यम नहीं, बल्कि ईश्वर की पूजा के समान है. इसीलिए कहा जाता है कर्म ही पूजा है.</p>

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