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लखनऊ अग्निकांड: एक आग, 15 मौतें और अनगिनत आंसू… अलीगंज हादसे की दर्दनाक कहानी

लखनऊ अग्निकांड: एक आग, 15 मौतें और अनगिनत आंसू... अलीगंज हादसे की दर्दनाक कहानी

लखनऊ अग्निकांड में सामने आईं दिल दहला देने वाली कहानियां.

Lucknow Coaching Centre Fire News: लखनऊ के अलीगंज के सेक्टर-H स्थित एक व्यावसायिक इमारत में सोमवार दोपहर लगी भीषण आग ने 15 परिवारों की खुशियां हमेशा के लिए छीन लीं. वीडियो गेमिंग और 3डी एनीमेशन कंपनी ‘हेड हॉपर स्टूडियो’ में काम करने वाले 15 युवा पेशेवर धुएं और आग की चपेट में आकर जिंदगी हार गए. मरने वालों की उम्र 18 से 30 वर्ष के बीच थी. कोई अपने परिवार का इकलौता बेटा था, किसी की शादी तय होने वाली थी और कोई घर की आर्थिक उम्मीदों का सहारा बना हुआ था. मंगलवार को जब कानपुर में संयम विज की अर्थी उठी तो परिवार में कोहराम मच गया. 10 दिन पहले ही उनकी दादी का निधन हुआ था और मंगलवार को उनकी तेरहवीं थी, लेकिन नियति ने ऐसा क्रूर मजाक किया कि उसी दिन परिवार को संयम का अंतिम संस्कार भी करना पड़ा.

धुएं से भरा अंधेरा, जान बचाने के लिए पाइप का सहारा

हादसे में बाल-बाल बचीं लवप्रीत कौर उस भयावह मंजर को याद कर आज भी सिहर उठती हैं. TV9 डिजिटल से बात करते हुए कहती हैं कि दोपहर में लंच के दौरान अचानक पूरे ऑफिस में धुआं भरने लगा. कुछ ही मिनटों में सांस लेना मुश्किल हो गया. इसी बीच बिजली चली गई और चारों तरफ अंधेरा छा गया. लवप्रीत बताती हैं, “सीढ़ियां दिखाई नहीं दे रही थीं. तभी किसी ने बताया कि एक खिड़की खुली हुई है. वहां पहुंची तो बाहर एक पाइप दिखाई दी. उसी के सहारे जान जोखिम में डालकर नीचे उतरी. सिर और पैर में चोटें आईं, लेकिन जान बच गई. उनका आरोप है कि नीचे मौजूद पेट शॉप के लोगों ने आग की सूचना ऊपर मौजूद कर्मचारियों को समय रहते नहीं दी और खुद बाहर निकल गए.

Lucknow Fire News

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खिड़की और पाइप बने जीवन की आखिरी उम्मीद

कंपनी के प्रोडक्शन हेड भूवन श्रीवास्तव भी उसी पाइप के सहारे बाहर निकल पाए. उन्होंने बताया कि महज एक मिनट के भीतर धुआं इतना घना हो गया कि कुछ भी दिखाई देना बंद हो गया था. भूवन की आंखें भर आती हैं, जब वह कहते हैं कि मैंने दो साथियों को खिड़की से नीचे उतारा, लेकिन अपने चचेरे भाई आदित्य श्रीवास्तव को नहीं बचा पाया. एक अन्य कर्मचारी मोहम्मद आसिफ ने बताया कि शुरू में सभी को लगा कि मामूली आग लगी है, लेकिन कुछ ही देर में पूरा कॉरिडोर धुएं से भर गया और बाहर निकलने का रास्ता बंद हो गया. किसी तरह तार पकड़कर खिड़की तक पहुंचे और जान बचा सके.

पापा, मुझे बचा लो…

इस हादसे की सबसे मार्मिक तस्वीर उन आखिरी फोन कॉल्स में छिपी है, जो फंसे हुए युवाओं ने अपने परिजनों को की थीं. बाराबंकी के 18 वर्षीय शाहजान ने आग के बीच अपने पिता को फोन किया था. पिता मोहम्मद इमरान बताते हैं, वह लगातार कह रहा था- पापा बचा लो… पापा बचा लो… लेकिन हम कुछ नहीं कर सके. गेम डिजाइनर सुखमणि सिंह ने भी अपने पिता प्रभाजोत सिंह को अंतिम कॉल कर कहा था, “पापा, मुझे बचा लो.

Lucknow Fire (1)

शादी के सपने धुएं में बदल गए

28 वर्षीय नीलेश और 30 वर्षीय अनामिका सामंत की मुलाकात इसी कंपनी में काम के दौरान हुई थी. दोनों एक-दूसरे को पसंद करते थे और जल्द ही शादी होने वाली थी, लेकिन आग ने दोनों की जिंदगी ही छीन ली. नीलेश के पिता शत्रुघ्न लाल बिजली विभाग से सेवानिवृत्त हैं. वहीं अनामिका अपने परिवार की बड़ी बेटी थीं और पिछले तीन वर्षों से 3डी आर्टिस्ट के रूप में काम कर रही थीं. दोनों परिवारों ने कभी नहीं सोचा था कि शादी की तैयारियों की जगह अंतिम संस्कार की तैयारी करनी पड़ेगी.

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इकलौते बेटों के साथ बुझ गए घरों के चिराग

हरियाणा के सोनीपत निवासी भविष्य शर्मा महज 23 वर्ष के थे. छह दिन पहले ही नौकरी जॉइन करने लखनऊ आए थे. पिता नरेंद्र एक निजी स्कूल में शिक्षक हैं. भविष्य परिवार का इकलौता बेटा था. अब्दुल रहमान भी घर के इकलौते बेटे थे. उनके पिता 2022 से लकवाग्रस्त हैं. परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी काफी हद तक उन्हीं के कंधों पर थी. शाहजान भी अपने परिवार के इकलौते बेटे थे. उनके अलावा तीन बहनें हैं.

Lucknow Fire

धुएं ने छीनी 15 जिंदगियां

डॉक्टरों के अनुसार, अधिकांश युवाओं की मौत आग से जलने की बजाय धुएं में दम घुटने से हुई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी सफोकेशन को प्रमुख कारण बताया गया है. यही वजह रही कि अधिकांश शवों पर गंभीर जलने के निशान नहीं मिले.

सवालों के घेरे में सुरक्षा इंतजाम

हादसे से बचे कर्मचारियों का आरोप है कि इमारत में पर्याप्त अग्नि सुरक्षा इंतजाम नहीं थे. छत पर जाने का रास्ता बंद था और वहां ताला लगा हुआ था. कई कर्मचारियों का कहना है कि फायर ब्रिगेड को सूचना देने के बावजूद राहत दल घटनास्थल पर देर से पहुंचा. इस दर्दनाक हादसे ने सिर्फ 15 जिंदगियां नहीं छीनीं, बल्कि 15 परिवारों के सपने, उम्मीदें और भविष्य भी अपने साथ ले गया.

किसी मां की गोद सूनी हो गई, किसी बहन का भाई चला गया, किसी पिता का सहारा छिन गया और किसी की होने वाली जिंदगीसाथी हमेशा के लिए बिछड़ गई. अलीगंज की उस इमारत में लगी आग अब बुझ चुकी है, लेकिन उन परिवारों के दिलों में उठी पीड़ा की आग शायद कभी नहीं बुझ पाएगी.

पंकज चतुर्वेदी

पंकज चतुर्वेदी

पंकज चतुर्वेदी को पत्रकारतिा के क्षेत्र में एक दशक से ज्यादा का अनुभव है. देश और उत्तरप्रदेश की राजनीति को कवर करते आ रहे हैं. दिल्ली में अमर उजाला और पंजाब केसरी से पत्रकारिता की यात्रा की शुरुआत हुई.  दिल्ली में 2 साल की पत्रकारिता के बाद मिट्टी की खुशबू यूपी खींच लाई और तब से राजधानी लखनऊ में ही पत्रकारिता हो रही है. 2017 में यात्रा को विस्तार देते हुए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े. राजनीतिक खबरों में गहरी रुचि और अंदर की खबर को बाहर लाने का हुनर, साथ ही यूपी की ब्यूरोकेसी में खास पकड़.  पत्रकारिता का फलसफा खबरों को खबर के रूप में ही जनता तक पहुंचाना.

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