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योगी सरकार में पंचायती राज संस्थाएं कितनी सशक्त, HC के फैसले पर विपक्ष की राजनीति कितना सही?

एक बड़ा प्रश्न हम सबके समक्ष है कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति क्या है? जवाब बहुत सारे हो सकते है, जैसे कि जनादेश सबसे बड़ी शक्ति है लेकिन बात पूरे लोकतंत्र की हो रही है. जनादेश यह तय करता है कि सत्ता किसकी होगी लेकिन जब लोकतंत्र के बारे में विचार करेंगे तो उसकी असली ताकत संविधान द्वारा निर्धारित संस्थाओं के बीच संतुलन और परस्पर सम्मान के रूप में उभरकर सामने आएगी. शासन जनता के विश्वास से चलता है, किंतु उसकी वैधता संविधान से आती है. इसलिए जब न्यायपालिका किसी प्रशासनिक निर्णय की संवैधानिक समीक्षा करती है, तो वह किसी सरकार की पराजय या विपक्ष की विजय का अवसर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्वाभाविक प्रक्रिया है.

दुर्भाग्य से आज न्यायालयों के निर्णय भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनते जा रहे हैं. फैसलों की कानूनी व्याख्या से अधिक उन्हें राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू पर तौला जा रहा है, जिससे समाज में भ्रम और अविश्वास का वातावरण पैदा होता है. ऐसी परिस्थितियों में यह आवश्यक है कि न्यायिक निर्णयों को उनकी संवैधानिक भावना के अनुरूप समझा जाए, न कि राजनीतिक प्रचार के औजार के रूप में देखा जाए.

विपक्ष का मुद्दा किस दिशा की ओर जा रहा?

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय, जिसमें ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने की व्यवस्था को असंवैधानिक ठहराया गया है, इसी समीक्षा की एक स्वाभाविक परिणति है. लेकिन यहां सहमति और असहमति के विकल्प भी हैं. संविधान में असहमति के बिंदु पर आगे जाने की व्यवस्था भी है. तो मुझे ऐसा लगता है कि चूंकि सरकार ने ग्रामीण विकास कार्यों को केंद्र में रखते हुए यह फैसला लिया था तो वह अपने संविधान सम्मत विकल्प भी देखेगी. लेकिन विपक्ष जिस प्रकार इस न्यायिक निर्णय को राजनीतिक मुद्दा बनाने के लिए आतुर है, यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है.

राज्य सरकार ने एक प्रयास किया था कि किसी भी अवरोध पर गांवों का विकास अवरुद्ध न होने पाए. जो विकास कार्य चल रहे हैं, वे रुकने न पाएं. इसमें सरकार का अपना पक्ष विकास का है. न्यायालय का अपना पक्ष है, लेकिन इसी के साथ एक बड़ा प्रश्न इस बात का भी है कि विपक्ष के दायित्व क्या होने चाहिए थे. न्यायालय की गरिमा का सम्मान होना चाहिए, लेकिन जब बात विकास की हो, ग्रामीण जनता के विकास की हो तो विपक्ष का उसमें राजनीतिक स्वार्थ देखना कितना न्यायोचित है, इस पर विचार करना होगा.

Allahabad Hc

(सुरेश बहादुर सिंह,पूर्व अपर शासकीय अधिवक्ता,इलाहाबाद हाईकोर्ट)

सरकार का सहयोग देना भी लोकतांत्रिक कर्तव्य

ऐसे मुद्दों पर संकीर्णता को त्याग कर सरकार का सहयोग देना भी विपक्ष का लोकतांत्रिक कर्तव्य है. लेकिन न्यायालय के आदेश को सही रूप में जनता तक पहुंचाने के बजाय विपक्ष ने भ्रम, भय और असत्य का एक ऐसा जाल बुनना शुरू कर दिया, जो न ग्राम प्रधानों के हित में है, न ग्रामीण समाज के और न ही इस देश के लोकतंत्र के.

यह समझना आवश्यक है कि विपक्ष कौन से भ्रम फैला रहा है और वास्तविकता क्या है. पहला और सबसे बड़ा भ्रम यह फैलाया जा रहा है कि राज्य सरकार ने जानबूझकर असंवैधानिक कार्य किया. विपक्ष की मंशा यह स्थापित करने की है कि सरकार संविधान का उल्लंघन करने की मंशा से काम कर रही थी, लेकिन क्या वाकई ऐसा है? नहीं, सरकार ने वही किया जो कोई भी जिम्मेदार व सजग संस्था करती. क्षेत्रीय विकास सुनिश्चित करने के लिए ग्राम प्रधान को ही प्रशासक बनाना सर्वाधिक उपयुक्त निर्णय था.

फैसले की संवैधानिक व्याख्या एक जटिल और बहुआयामी प्रक्रिया है. सरकारें प्रशासनिक निर्णय लेती हैं, न्यायालय उनकी संवैधानिक समीक्षा करता है और यदि न्यायालय किसी व्यवस्था को संविधान के अनुरूप नहीं पाता तो सरकार उस आदेश को स्वीकार करते हुए आवश्यक कदम उठाती है या अपने पक्ष को उचित मानते हुए बड़ी बेंच या शीर्ष अदालत तक जाती है. यही संवैधानिक लोकतंत्र की सुंदरता है और यही उसकी ताकत भी. न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के बीच यह संतुलन हमारे संविधान की आत्मा है. जब न्यायालय किसी व्यवस्था की संवैधानिक समीक्षा करता है तो इसका अर्थ यह है कि संवैधानिक व्याख्या का एक नया आयाम सामने आया है. आप सहमत हों तो स्वीकार करें या फिर इसे चुनौती दें.

अटकलबाजी में वास्तविक तथ्यों की अनदेखी

कोर्ट के आदेश को केंद्र में रखते हुए एक भ्रम यह भी फैलाया जा रहा है कि ग्राम प्रधानों द्वारा किए गए अब तक के सभी कार्य और भुगतान अवैध हो गए हैं. इसे इतने जोर-शोर से फैलाया जा रहा है मानो पिछले पांच सालों में गांवों में हुआ हर निर्माण कार्य, हर सड़क, हर नाली, हर सामुदायिक भवन अब गैरकानूनी हो गया हो. यह न केवल कानूनी दृष्टि से निराधार है, बल्कि अत्यंत गैरजिम्मेदाराना भी है. जब बात गांव के विकास के लिए किए जा रहे कार्यों की हो रही हो, तो उसमें विपक्ष का दायित्व है कि वह सकारात्मक रुख अपनाए. इसे राजनीतिक मुद्दे के रूप में उठाने को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता. राजनीतिक अटकलबाजी में वास्तविक तथ्यों की अनदेखी नहीं की जा सकती.

इस संदर्भ में एक और बात महत्वपूर्ण है जिसे विपक्ष सायास खड़ा कर रहा है. वह यह कि ग्राम प्रधानों से उनके कार्यकाल में खर्च किए गए धन की वसूली की जाएगी. विपक्ष यह भ्रम फैलाकर उन हजारों ग्राम प्रधानों के मन में भय व आतंक का वातावरण बनाने की कोशिश कर रहा है, जिन्होंने ईमानदारी से अपने गांवों की सेवा की है. जो प्रतिनिधि सरकारी योजनाओं को जमीन पर उतारने में लगे रहे, जिन्होंने प्रधानमंत्री आवास योजना से लेकर स्वच्छ भारत मिशन तक को गांव-गांव पहुंचाने में अपना योगदान दिया, उन्हें भयभीत करना राजनीतिक दुर्भावना की पराकाष्ठा है.

एक सहज सवाल स्वाभाविक है कि विपक्ष यह भ्रम और भय क्यों फैला रहा है? इसके उत्तर में उन लोगों की प्रवृत्ति को देखना होगा, जिन्हें जनता खारिज कर चुकी है. जिन दलों के पास न कोई रचनात्मक नीति हो, न जनता के विकास का कोई ठोस दृष्टिकोण और न ही सत्ता में रहते हुए ग्रामीण उत्थान का कोई उल्लेखनीय इतिहास हो, उन्हें अदालती आदेश में अपने लिए संभावनाएं नजर आ रही हैं. अपने संकीर्ण स्वार्थ के लिए वे इसे भुनाने की चेष्टा करना चाहते हैं. ग्रामीण लोगों को भ्रमित करके यह सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है कि सरकार उनकी विरोधी है. वास्तविकता सबके सामने है.

अदालत के आदेश को समझा जाना जरूरी

योगी सरकार में पंचायती राज संस्थाएं कितनी सशक्त हुई हैं, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं. अदालत के आदेश पर कोई असंतुलित प्रतिक्रिया न देना न्यायपालिका के प्रति सरकार के सम्मान भाव का परिचायक है और वह इसके लिए प्रतिबद्ध भी प्रतीत होती है. हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार के पास बड़ी बेंच या शीर्ष अदालत में अपील का अधिकार भी है. पंचायतों के विकास कार्य किसी भी स्थिति में प्रभावित नहीं होने दिए जाएं, यह उसकी प्रतिबद्थता भी है.

लोकतंत्र में न्यायालय की भूमिका संविधान के संरक्षक की है. जब वह किसी व्यवस्था की समीक्षा करता है और उसे परिमार्जित करने का निर्देश देता है, तो यह लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण है. संवैधानिक संस्थाओं का सक्रिय रहना, सजग रहना, यह संदेश देता है कि वे अपने दायित्व निभा रही हैं. न्यायालय का सम्मान, संविधान की रक्षा और गांवों का निर्बाध विकास. इन तीनों को एक साथ चलना चाहिए और इसे सुनिश्चित करना सबकी जिम्मेदारी है. सुशासन न्यायपालिका का सम्मान करता है और जनता के हितों की सुरक्षा भी. इसलिए माना जा सकता है कि सरकार सुसंगत फैसले लेगी, संविधान सम्मत लेगी, जो विपक्ष के भ्रमजाल का जवाब भी होगा.

(इस लेख में लेखक के निजी विचार हैं.)

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