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Explained: बहुमत नहीं मिलने के बाद भी क्या PM बने रह सकते हैं नेतन्याहू? बचें हैं केवल ये 4 विकल्प

इजराइल के राजनीतिक परिदृश्य में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है. देश के चुनावों के अंतिम नतीजे आने से कुछ ही घंटे पहले जो तस्वीर उभरी थी, उसने इजराइली राजनीति के उन गहरे अंतर्विरोधों और वैचारिक विभाजनों को उजागर कर दिया है, जो लंबे समय से देश की सत्ता और समाज को प्रभावित करते आए हैं. इस चुनाव में एक बात बिल्कुल साफ हो चुकी थी कि बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले धुर-दक्षिणपंथी गठबंधन ने अपना बहुमत और जनादेश खो दिया है, और संख्या के हिसाब से विपक्ष के पास स्पष्ट बहुमत मौजूद है. इसके बावजूद, इज़राइल की सत्ता का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि राजनीति के इस चौराहे पर विभिन्न दल क्या रुख अपनाते हैं.

चुनाव के नतीजे और विपक्ष का नैतिक व संख्यात्मक पलड़ा

चुनाव के दिन जब मतदान समाप्त हुआ, तो आंकड़े गवाही दे रहे थे कि नेतन्याहू का मौजूदा गठबंधन सत्ता खो चुका है. मध्य-वामपंथी ‘डेमोक्रेट्स’ के नेता यायर गोलान ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में कहा था, “नेतन्याहू हार गए हैं. मुझे गिनती आती है.” इज़राइल की कुल आबादी का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा फिलिस्तीनी नागरिकों (अरब इज़राइलियों) का है, और विपक्ष के एक बड़े हिस्से का मानना था कि नेतन्याहू को सत्ता से बेदखल करने के लिए इन नागरिकों और उनके प्रतिनिधियों के साथ मिलकर एक नई सरकार का गठन किया जाना चाहिए.

राजनीतिक मनोविज्ञान के शोधकर्ता एरन हैल्परिन द्वारा चुनाव के दिन किए गए एक सर्वे से यह भी सामने आया कि विपक्षी मतदाताओं का एक स्पष्ट बहुमत इस बात के पक्ष में था कि नेतन्याहू को रोकने के लिए फिलिस्तीनी-नेतृत्व वाले ‘राअम’ (Ra’am) दल के साथ गठबंधन किया जाए. ‘जॉइंट लिस्ट’ के नेता यूयूजफ जबरीन ने भी खुलकर कहा कि वे नेतन्याहू सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए यहूदी-अरब साझेदारी के साथ काम करने को पूरी तरह तैयार हैं. फिलिस्तीनी नागरिकों के लिए यह केवल एक राजनीतिक समीकरण नहीं था, बल्कि उनके वजूद का सवाल था. देश के भीतर लगातार बढ़ते अपराध, भेदभाव, घरों को तोड़े जाने, और वेस्ट बैंक व गाजा में जारी संघर्ष के बीच वे रिकॉर्ड संख्या में मतदान केंद्रों पर पहुंचे थे ताकि बदलाव लाया जा सके.

विपक्ष का आत्मघाती अवरोध

संख्यात्मक रूप से मजबूत होने के बावजूद, इज़राइल का यहूदी विपक्ष एक अजीबोगरीब मानसिक और वैचारिक असमंजस में फंसा नजर आया. अधिकांश मुख्यधारा के यहूदी विपक्षी दलों ने फिलिस्तीनी-नेतृत्व वाली पार्टियों के साथ सरकार चलाने से साफ इनकार कर दिया. यह स्थिति एक ऐसे ज़हरीले और ध्रुवीकरण वाले चुनाव अभियान के साये में उपजी, जिसमें नेतन्याहू ने फिलिस्तीनी नागरिकों को लगातार देश के भीतर का ‘दुश्मन’ साबित करने की कोशिश की थी.

यह अजीब विडंबना है कि जहां एक ओर फिलिस्तीनी पार्टियों को ‘अछूत’ माना गया, वहीं नेतन्याहू के अपने गठबंधन में ऐसे कई अति-रूढ़िवादी (अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स) यहूदी समूह शामिल रहे हैं जो तकनीकी रूप से खुद को ‘ज़ायोनी’ नहीं मानते हैं. लेकिन विपक्ष के भीतर इस दोहरे मापदंड ने नेतन्याहू के लिए संजीवनी का काम किया. सबसे बड़े विपक्षी दल का नेतृत्व कर रहे पूर्व जनरल गादी आइसेनकोट ने फिलिस्तीनियों के साथ सरकार बनाने को सीधे तौर पर तो नहीं नकारा, लेकिन उन्होंने ऐसी शर्तें और सीमाएं तय कर दीं जिनके चलते उनका किसी भी साझा गठबंधन में शामिल होना असंभव हो गया. संगीतकार याली सोबोल ने सोशल मीडिया पर इस पर कटाक्ष करते हुए लिखा था कि यदि ये दल अपने नस्लीय पूर्वाग्रहों को छोड़ दें, तो उन्हें अहसास होगा कि वे चुनाव जीत चुके हैं.

इस वैचारिक दीवार और हिचकिचाहट के कारण विपक्षी नेता बुधवार को खामोश रहे. वे नेतन्याहू को हराना तो चाहते थे, लेकिन फिलिस्तीनियों के साथ काम न करने की अपनी पुरानी राजनीतिक कसमें तोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाए. और यहीं से नेतन्याहू की राजनीतिक पुनर्जीवन की पटकथा लिखनी शुरू हुई.

नेतन्याहू के सामने अब कौन से चार प्रमुख विकल्प हैं?

विपक्ष की इस आंतरिक कमजोरी और हिचकिचाहट ने बेंजामिन नेतन्याहू को एक बार फिर से गेम में ला खड़ा किया है. यदि विपक्षी दल आपस में एकजुट होकर और अरब पार्टियों को साथ लेकर कोई वैकल्पिक सरकार पेश करने में विफल रहते हैं, तो नेतन्याहू के सामने सत्ता में बने रहने या अपनी पराजय को जीत में बदलने के निम्नलिखित चार रास्ते खुलते हैं

नेतान्याहू-आइसेनकोट ‘राष्ट्रीय एकता’ समझौता

इस विकल्प के तहत, नेतन्याहू विपक्ष के प्रमुख चेहरे और पूर्व जनरल गादी आइसेनकोट के सामने ‘राष्ट्रीय संकट’ या स्थिरता का हवाला देकर एक राष्ट्रीय एकता सरकार का प्रस्ताव रख सकते हैं. इसमें प्रधानमंत्री पद के लिए रोटेशन फॉर्मूला (यानी कुछ समय नेतन्याहू और कुछ समय आइसेनकोट प्रधानमंत्री रहें) भी शामिल हो सकता है. यदि यह समझौता परवान चढ़ता है, तो यह नेतन्याहू को एक तीर से कई निशाने साधने का मौका देगा:

इससे वे अपने धुर-दक्षिणपंथी और कट्टर सहयोगियों की ब्लैकमेलिंग और अत्यधिक निर्भरता से आज़ाद हो जाएंगे. वे फिलिस्तीनी पार्टियों को पूरी तरह से सत्ता के गलियारों से बाहर रखने में कामयाब हो जाएंगे. इज़राइली मीडिया (जैसे ‘चैनल 12’) में पहले ही इस तरह के विकल्पों पर सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है, जो इसे देश के लिए एक ‘व्यावहारिक’ रास्ता बता रहा है.

विपक्षी खेमे से सांसदों की ‘खरीद-फरोख्त’ या सेंधमारी 

इजराइली राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले बेंजामिन नेतन्याहू जोड़-तोड़ की राजनीति में माहिर माने जाते हैं. बहुमत के जादुई आंकड़े (61 सीटों) से कुछ ही कदम दूर रहने की स्थिति में, नेतन्याहू विपक्ष के खेमे (विशेषकर दक्षिणपंथी या मध्यमार्गी यहूदी धड़ों) में सेंध लगा सकते हैं.

यदि वे विपक्ष से 2 से 4 असंतुष्ट सांसदों को तोड़कर अपने पाले में लाने में सफल हो जाते हैं, तो उनका पुराना गठबंधन या थोड़ा बहुत संशोधित गठबंधन फिर से बहुमत का जादुई आंकड़ा छू सकता है.

हालांकि यह रास्ता नैतिक रूप से विवादास्पद होगा, लेकिन इज़राइल के राजनीतिक इतिहास में सत्ता बचाने के लिए पाला-बदल कराना कोई नया चलन नहीं है.

अल्पमत की सरकार

यदि विपक्ष अपने वैचारिक पूर्वाग्रहों के चलते फिलिस्तीनी नेतृत्व वाली पार्टियों (जैसे Ra’am या Joint List) को सरकार में शामिल होने या बाहर से समर्थन देने के लिए राजी नहीं कर पाता है, और कोई अन्य मजबूत वैकल्पिक गठबंधन भी सामने नहीं आता है, तो नेतन्याहू संसद में अल्पमत की सरकार चला सकते हैं.

इस स्थिति में, जब तक संसद (नेसेट) में उनके खिलाफ कोई विधिवत अविश्वास प्रस्ताव पारित नहीं हो जाता या कोई दूसरा गुट 61 स्पष्ट सदस्यों के समर्थन का दावा पेश नहीं करता, नेतन्याहू प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज रह सकते हैं.

यह बेशक एक बेहद अस्थिर और कमजोर सरकार होगी, लेकिन राजनीति में ‘सत्ता में बने रहना’ अपने आप में एक बड़ी ताकत है, और नेतन्याहू इस कला में माहिर हैं.

कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में टिके रहना और दोबारा चुनाव

यदि सभी राजनीतिक जोड़-तोड़ और बातचीत विफल हो जाती हैं और कोई भी दल सरकार बनाने में सक्षम नहीं होता है, तो देश को एक बार फिर से अनिश्चितता के दौर से गुजरना होगा.

इस परिस्थिति में, नेतन्याहू लंबे समय तक ‘केयरटेकर’ (कार्यवाहक) प्रधानमंत्री की हैसियत से देश की कमान संभाले रखेंगे. इज़राइली राजनीतिक नियमों के अनुसार, जब तक नई सरकार का गठन नहीं होता, पुरानी सरकार और उसके मुखिया कार्यवाहक के रूप में काम करते रहते हैं. यह स्थिति नेतन्याहू को देश को एक और नए चुनाव की ओर धकेलने का पूरा मौका देगी. इस बीच वे जनता के बीच जाकर अपनी राजनीतिक जमीन को फिर से मजबूत करने और विपक्षी दलों में फूट डालने के लिए भरपूर समय पा जाएंगे.

यहूदी भविष्य बनाम लोकतांत्रिक भविष्य की दोरहाही

इस पूरे घटनाक्रम ने इजराइल के बुनियादी चरित्र के सामने एक गहरा संकट खड़ा कर दिया है. इज़राइल लंबे समय से खुद को एक साथ ‘यहूदी और लोकतांत्रिक’ राज्य के रूप में परिभाषित करता आया है. लेकिन इस चुनाव के बाद उपजे हालात ने इस दावे की पोल खोल दी है.

यदि संसद में देश के 20 प्रतिशत नागरिकों (फिलिस्तीनी अल्पसंख्यकों) के प्रतिनिधियों को केवल उनकी नस्ल और पहचान के आधार पर सरकार गठन की प्रक्रिया से पूरी तरह बहिष्कृत कर दिया जाता है, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि इज़राइल अब एक चौराहे पर खड़ा है. जैसा कि इस पूरे घटनाक्रम से संकेत मिलता है, नेतन्याहू और मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था ने इस वादे को एक कठोर विकल्प में बदल दिया है, जहां या तो केवल एक ‘यहूदी भविष्य’ को चुना जा सकता है या फिर सच्चे अर्थों में एक ‘लोकतांत्रिक भविष्य’ को.

फिलहाल, गेंद विपक्ष के पाले में कम और उनकी वैचारिक संकीर्णता पर ज्यादा टिकी है. यदि विपक्षी दल अपने पूर्वाग्रहों को त्यागकर समावेशी राजनीति का परिचय नहीं देते हैं, तो यह नेतन्याहू की राजनीतिक चतुरता की ही जीत होगी, जो अपनी चुनावी हार को भी एक और शानदार राजनीतिक कार्यकाल या अनिश्चितकालीन सत्ता में तब्दील करने में सफल हो जाएंगे.

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