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दक्षिण के राज्यों में सुधर रहा फर्टिलिटी रेट, बिहार-यूपी को झटका, यहां घटने लगी आबादी

दक्षिण के राज्यों में सुधर रहा फर्टिलिटी रेट, बिहार-यूपी को झटका, यहां घटने लगी आबादी

इन राज्यों में बढ़ रही है जन्म-दर

देश में जनसंख्या और जन्म दर को लेकर अब एक नई तस्वीर उभर रही है. जिन दक्षिणी राज्यों को लंबे समय तक कम होती फर्टिलिटी और जनसंख्या नियंत्रण का उदाहरण माना जाता था, वहां अब टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) के मुताबिक आंध्र प्रदेश में TFR 1.7 से बढ़कर 1.8, कर्नाटक में 1.7 से 1.8 और तेलंगाना में 1.8 से 1.9 हो गई है. वहीं दूसरी ओर, देश के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य बिहार और उत्तर प्रदेश में जन्म दर लगातार घट रही है.

बिहार की TFR 3.0 से घटकर 2.7 और उत्तर प्रदेश की 2.4 से घटकर 2.2 पर आ गई है. संसद में 24 जुलाई 2026 को पेश आंकड़ों के अनुसार देश की टोटल फर्टिलिटी रेट 2.0 पर बनी हुई है, जो रिप्लेसमेंट लेवल (2.1) से नीचे है. ऐसे में जहां दक्षिण के कुछ राज्यों में भविष्य में वर्किंग पॉपुलेशन घटने और बढ़ती बुजुर्ग आबादी की चिंता के बीच फर्टिलिटी बढ़ने को सकारात्मक संकेत माना जा रहा है, वहीं बिहार और यूपी जैसे राज्यों में तेजी से घटती जन्म दर देश की बदलती पॉपुलेशन ट्रेंड की ओर इशारा करती है. आइए इन आंकड़ों को डिटेल में समझते हैं.

बिहार-यूपी में भी घटी जन्म दर

मंत्रालय की ओर से संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार बिहार की TFR NFHS-5 (2019-21) में 3.0 थी, जो NFHS-6 में घटकर 2.7 रह गई है. इसी तरह उत्तर प्रदेश की TFR 2.4 से घटकर 2.2 पर आ गई है. यानी जिन राज्यों की आबादी लंबे समय तक देश की जनसंख्या वृद्धि का मुख्य आधार रही, वहां भी परिवारों का आकार लगातार छोटा हो रहा है.

Bihar Ki Janmadar

दक्षिण के राज्यों में पहले से ही रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे

दक्षिण भारत के राज्यों में जन्म दर पहले से ही रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे चल रही है. NFHS-6 के मुताबिक आंध्र प्रदेश की TFR 1.8, कर्नाटक की 1.8 और तमिलनाडु की 1.7 दर्ज की गई है. तेलंगाना में यह 1.9 है. केरल में भी TFR 1.8 पर बनी हुई है.

इन आंकड़ों को देखते हुए इन राज्यों में भविष्य में वर्कर्स की कमी, तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी और इकोनॉमिक ग्रोथ पर असर की आशंकाओं के बीच आबादी बढ़ाने को लेकर चर्चा हो रही है. हालांकि संसद में पेश स्वास्थ्य मंत्रालय के जवाब में इन राज्यों के लिए किसी खास नीति का जिक्र नहीं किया गया है.

सबसे कम और सबसे ज्यादा TFR वाले राज्य और UT

आंकड़ों के अनुसार सबसे कम TFR अंडमान-निकोबार द्वीप समूह (0.9) और सिक्किम (1.0) में दर्ज की गई है, जबकि सबसे ज्यादा TFR बिहार (2.7) में है. इसके बाद उत्तर प्रदेश और झारखंड (दोनों 2.2) का स्थान है. लक्षद्वीप में TFR NFHS-5 के 1.4 से बढ़कर NFHS-6 में 2.2 हो गई है. हालांकि, ध्यान देने वाली बात यह है कि बिहार भले ही अभी सभी राज्यों में सबसे आगे है, लेकिन वहां भी फर्टिलिटी रेट में गिरावट देखने को मिली है.

सबसे ज्यादा TFR वाले टॉप 10 राज्य/UT

सरकार का रुख

सरकार ने संसद में बताया कि उसका ध्यान फिलहाल हेल्दी मदरहुड, गर्भधारण के बीच सही गैप (Healthy Timing and Spacing of Pregnancies) और फैमिली प्लानिंग सर्विसेज को मजबूत करने पर है. यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 और सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल (SDG) 2030 के अनुरूप है.

इसके लिए गर्भनिरोधक साधनों की संख्या बढ़ाने, डिलीवरी के बाद गर्भनिरोधक सुविधा, आशा कार्यकर्ताओं के जरिए घर-घर गर्भनिरोधक उपलब्ध कराने और मिशन परिवार विकास जैसे कार्यक्रम 13 राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, नागालैंड और मिजोरम में चलाए जा रहे हैं. इन कार्यक्रमों की समीक्षा कॉमन रिव्यू मिशन, राष्ट्रीय कार्यक्रम समन्वय समिति और NFHS जैसे सिस्टम के जरिए की जाती है.

South India Me Fertility Rate

घटती-बढ़ती जन्म दर के फायदे और नुकसान

जन्म दर घटने के संभावित नुकसान

  • भविष्य में वर्किंग एज पॉपुलेशन कम हो सकती है, जिससे वर्कर्स की कमी हो सकती है.
  • बुजुर्गों की आबादी का अनुपात बढ़ने से डिपेंडेंसी रेशियो बिगड़ सकता है. यानी हर कमाने वाले व्यक्ति पर आश्रित लोगों की संख्या बढ़ सकती है.
  • पेंशन, हेल्थकेयर और सोशल सिक्योरिटी योजनाओं पर दबाव बढ़ सकता है.
  • लंबे समय में इकोनॉमिक ग्रोथ प्रभावित हो सकती है, क्योंकि उपभोक्ताओं और कामकाजी आबादी दोनों की संख्या घट सकती है.
  • लोकसभा सीटों के परिसीमन (डिलिमिटेशन) जैसे राजनीतिक मुद्दों पर भी असर पड़ सकता है. जनसंख्या नियंत्रण में आगे रहने वाले
  • राज्यों को प्रतिनिधित्व के मामले में नुकसान होने की आशंका जताई जाती रही है.

जन्म दर घटने के संभावित फायदे

  • प्रति व्यक्ति संसाधनों की उपलब्धता बेहतर हो सकती है, जिससे लाइफस्टाइल में सुधार की संभावना बढ़ती है.
  • छोटे परिवारों में बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य पर ज्यादा खर्च और ध्यान दिया जा सकता है.
  • महिलाओं की वर्कफोर्स में भागीदारी बढ़ सकती है और मातृ स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है.
  • पर्यावरण और शहरों के संसाधनों पर दबाव अपेक्षाकृत कम होता है.

जन्म दर ज्यादा होने के संभावित फायदे

  • युवा और कामकाजी आबादी का बड़ा आधार बना रहता है, जिसे डेमोग्राफिक डिविडेंड कहा जाता है.
  • लंबे समय तक लेबर फोर्स उपलब्ध रहती है, जिससे आर्थिक गतिविधियों पर असर कम पड़ता है.

जन्म दर ज्यादा होने के संभावित नुकसान

  • संसाधनों, शिक्षा और हेल्थ सर्विसेज पर दबाव बढ़ता है, खासकर जब इकोनॉमिक ग्रोथ जनसंख्या वृद्धि के बराबर न हो.
  • गरीबी, बेरोजगारी और तेज अर्बनाइजेशन से जुड़ी चुनौतियां बढ़ सकती हैं.

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देवेश कुमार पांडेय

देवेश कुमार पांडेय

देवेश कुमार पांडेय TV9 Hindi में बतौर सब-एडिटर काम कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के अमेठी के रहने वाले देवेश को राजनीति के अलावा इतिहास, साहित्य में दिलचस्पी है.  साल 2024 में भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) के अमरावती कैंपस से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. देवेश को घूमना, लिखना, पढ़ना और पॉडकास्ट सुनना पसंद है.

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