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बीजेपी को अब ‘विक्रमादित्य’ की याद क्यों आई? जानें ‘महानाट्य’ पर क्या है इतिहासकारों की राय

बीजेपी को अब ‘विक्रमादित्य’ की याद क्यों आई? जानें ‘महानाट्य’ पर क्या है इतिहासकारों की राय

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में विक्रमोत्सव-2026 के तहत गुप्तकालीन शासक चंद्रगुप्त विक्रमादित्य पर आधारित भव्य महानाट्य का आयोजन किया गया. प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में आयोजित इस कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव भी मौजूद रहे. इस दौरान सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि सम्राट विक्रमादित्य केवल एक राजा नहीं थे, बल्कि न्याय, धर्म और लोककल्याण के प्रतीक थे. उनका जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं.

वहीं, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि सम्राट विक्रमादित्य भारतीय इतिहास के ऐसे महान शासक थे जिनकी कीर्ति आज भी जनमानस में जीवित है उन्होंने कहा कि विक्रमादित्य का नाम न्याय और पराक्रम का पर्याय है. बीजेपी नेताओं ने कहा कि ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को भारत के गौरवशाली इतिहास से जोड़ते हैं. बीजेपी इस आयोजन को सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने की पहल बता रही है. वहीं, विपक्ष इसे चुनावी रणनीति के तौर पर देख रहा है.

इस नाट्य मंचन से क्या होगा? PDA से घबराई BJP

समाजवादी पार्टी के सांसद वीरेंद्र सिंह ने इसे चुनावी स्टंट करार देते हुए कहा कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी सांस्कृतिक मुद्दों के जरिए माहौल बनाने की कोशिश कर रही है. समाजवादी पार्टी के सांसद वीरेंद्र सिंह कहते हैं कि आपको अगर वर्तमान पीढ़ी को विक्रमादित्य के ही बारे में बताना है तो उनको अलग से सिलेबस का हिस्सा बनाइए.

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इस नाट्य मंचन से क्या होगा? आप सिर्फ हिन्दू मुसलमान करने वाला नरेटिव सेट करने में लगे हैं. हकीकत ये है कि बीजेपी के लोग पीडीए से घबराए हुए हैं और उसकी काट के लिए इस तरह का मंचन कराया जा रहा है.

देश जागृत होता है तो अपनी विरासत खोजता

विक्रमोत्सव-2026 को लेकर इतिहासकारों की राय भी बंटी हुई है. बीएचयू की प्रोफेसर वृंदा परांजपे मानती हैं कि विक्रमादित्य की सैन्य रणनीति जैसे शत्रु के शिविर में घुसकर हमला करना रहा है. वर्तमान सरकार की सुरक्षा नीति भी उसी से मेल खाती है. यह प्रसंग संस्कृत नाटक देवी चंद्रगुप्तम (लेखक विशाखदत्त) में भी मिलता है.

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वहीं, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर योगेश्वर तिवारी इसे इतिहास के पुनर्संतुलन की कोशिश बताते हैं. उन्होंने कहा कि आजादी के बाद रोमिला थापर को प्राचीन इतिहास की जिम्मेदारी दे दी गई जिनको ना संस्कृत आती थी ना हिन्दी. मध्यकालीन इतिहास को मध्यकालीन मुस्लिम इतिहास बना दिया गया. तो जब देश जागृत होता है तो अपनी विरासत खोजता है. मौजूदा समय में भी एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण काल से गुजर रहा है. उनके अनुसार, आजादी के बाद कुछ शासकों को ज्यादा महत्व मिला, जबकि अन्य की उपेक्षा हुई.

वाराणसी में ही क्यों हुआ ये कार्यक्रम?

समाज के प्रबुद्ध लोगों का मानना है कि वाराणसी को इस आयोजन के लिए चुनना भी रणनीतिक है. काशी पहले से ही सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्र है, जहां ऐसे कार्यक्रमों का प्रतीकात्मक असर ज्यादा होता है.

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वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र कुमार के मुताबिक, लोकसभा चुनाव में वाराणसी में जीत का अंतर कम होना और आगामी विधानसभा चुनाव इस पहल के पीछे अहम कारण हो सकते हैं. कहा जा रहा है कि सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य सिर्फ सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि इतिहास, पहचान और सियासत के मेल का एक उदाहरण बन गया है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इसका असर आने वाले चुनावों में कितना दिखाई देता है.

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