उत्तर प्रदेशभारत

525 साल पहले इस मुस्लिम लेखक ने पहचाना था योग का महत्व, फारसी भाषा में लिखी ये योगासन और उसके फायदे

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिला के जहूराबाद गांव के निवासी सैय्यद मुहम्मद गौस ने योगशास्त्र पर पुस्तक लिखी थी. उस किताब में उन्होंने ये भी बताया था कि कैसे कैसे योग किया जा सकता है और उनके क्या क्या लाभ हैं? उस पुस्तक का नाम ‘बहरुल हयात’ है. इस पुस्तक की खासियत यह है कि चित्रों द्वारा समझाया गया है और उन आसनों के बारे में निम्न इबारतें भी लिखी गई है. इसमें 22 आसन है. यह पुस्तक फारसी में लिखी है.

पूरे देश में 11वां योग दिवस मनाया जा रहा हैं. इसका नजारा शनिवार को देखने को मिला. गाजीपुर जिले का योग से संबंधित रिश्ता बहुत पुराना हैं. लगभग 525 वर्ष पहले जहुराबाद निवासी सूफी शाह गौस ने एक पुस्तक ‘बहरुल हयात’ योगासन पर लिखी थीं. इस पुस्तक में किस योग आसान से शरीर को क्या लाभ होगा और साथ में योग करने का क्या तरीका होगा, उसे भी विस्तार से बताया गया है.

पुस्तक में बताए योग के लाभ

मशहूर लेखक एवं इतिहासकार उबैदुर्र हमान साहब का कहना हैं कि इस योगासन पुस्तक में योग करने का सही समय क्या होगा जिससे शरीर चुस्त दुरुस्त रहे. इसके साथ पुस्तक में चित्र भी देकर योगासन का तरीका बताया गया हैं. इस पुस्तक में 22 आसन के बारे में बताया गया हैं. साथ ही इस पुस्तक में बताया गया हैं कि एक अच्छे योगी बनने के लिए समाज के हर वर्ग को इसे सीखना होगा.

ब्रिटिश लाइब्रेरी मौजूद है पुस्तक

उन्होंने कहा कि देशभर में बहुत धूम धाम से 11 वां योग दिवस मनाया जा रहा है. ब्रिटिश लाइब्रेरी के संग्रहालय में गाजीपुर जिला के जहूराबाद निवासी सैय्यद शाह मुहम्मद गौस द्वारा लिखित अरबी लिपि की एक पांडुलिपि ‘बहरुल हयात’ है, जो योगशास्त्र पर आधारित है. सैयद गौस जहूराबाद में 1500 ईस्वी में सैयद खतिरुद्दीन के घर पैदा हुए, जिनके दो भाई सैयद शाह बहलोल उर्फ फूल शाह तथा सैयद शाह मुराद अली थे. इसी गांव में एक तालाब गौसी तालाब मौजूद है जो आज भी क्षेत्र में लोकप्रिय हैं. इन लोगों के कुछ पवित्र अवशेष तालाब के निकट दफन हैं.

महान लेखक, कवि और दार्शनिक थे शाह गौस

1692 की फारसी पांडुलिपि ‘नसबनामा अस्सादत गाजीपुर’ से जानकारी मिलती है कि शाह गौस एक महान लेखक, कवि और दार्शनिक होने के साथ-साथ एक प्रख्यात योग गुरु भी थे. जिन्होंने प्राचीन योग ग्रंथों की व्याख्या करने वाली अपनी प्रसिद्ध रचनाओं के रूप में जवाहर-ए-खमसा और ‘बहरुल हयात’ की रचना की थी. शाह गौस ने अपने साहित्य में उस वक़्त के भारतीय संस्कृति की एक अमिट विरासत छोड़ी है. बल्कि उन्होंने न केवल कला, संस्कृति और साहित्य में अपनी भागीदारी के साथ, विभिन्न रूपों के अनुभव के माध्यम से भी भारत की सांस्कृतिक के साथ योग प्रथाओं से जुड़े रहे.



Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button