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3 युद्धों के योद्धा, 48 साल से ले रहे पेंशन; कहानी बागपत के पूर्व सैनिक लच्छीराम की

3 युद्धों के योद्धा, 48 साल से ले रहे पेंशन; कहानी बागपत के पूर्व सैनिक लच्छीराम की

पूर्व सैनिक लच्छीराम

देशभक्ति का ऐसा जज्बा बहुत कम देखने को मिलता है जैसा कि उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के ढिकौली गांव के रहने वाले पूर्व सैनिक लच्छीराम ने दिखाया. साल 1953 में जब उन्होंने सेना की वर्दी पहनी, तब उनकी तनख्वाह मात्र 35 रुपये प्रतिमाह थी. उस समय यह रकम भी बड़ी मानी जाती थी, लेकिन उनके मन में देश के लिए कुछ करने का जोश इससे कहीं ज्यादा बड़ा था. 24 साल तक लगातार सेवा देने के बाद वे साल 1977 में सेना से रिटायर्ड हुए.

आज उन्हें 55 हजार रुपये प्रतिमाह पेंशन मिलती है, जो इस बात का प्रतीक है कि देश अपने सच्चे सेवकों को कभी नहीं भूलता. लच्छीराम ने भारतीय सेना में रहते हुए तीन बड़े युद्धों- 1962 का चीन युद्ध, 1965 और 1971 के पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में भाग लिया. इन युद्धों के दौरान वे सीमाओं पर तैनात रहे और दुश्मन की हर चुनौती का डटकर सामना किया. उस दौर में सुविधाएं बेहद सीमित थीं, लेकिन जज्बा असीमित था.

गांव में गर्व से सुनाई जाती रिटायर्ड जवान का कहानियां

उनकी बहादुरी की कहानियां आज भी उनके गांव ढिकौली में बुजुर्गों और युवाओं के बीच गर्व से सुनाई जाती हैं. परिवार के लोगों के मुताबिक, लच्छीराम आज भी सेना की तरह अनुशासन में रहते हैं और समय के पाबंद हैं. उन्होंने अपने बच्चों को भी ईमानदारी, देशभक्ति और सेवा जैसे मूल्य सिखाए हैं. सेना से रिटायर होने के बाद उन्होंने खेती-बाड़ी और सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाई. गांव के कई लोग आज भी उनसे मार्गदर्शन लेने आते हैं.

‘दिल में देश होना चाहिए’

बच्चों और युवाओं को वे हमेशा देश सेवा के लिए प्रेरित करते हैं. उनका कहना है कि ‘देश के लिए वर्दी जरूरी नहीं, दिल में देश होना चाहिए.’ आज जब पेंशन के रूप में उन्हें हर महीने 55 हजार रुपये मिलते हैं, तो वह केवल एक रकम नहीं है, बल्कि यह उस त्याग और सेवा का सम्मान है जो उन्होंने इस राष्ट्र के लिए किया. ढिकौली जैसे छोटे गांव से निकलकर देश की सीमाओं की रक्षा करना और फिर एक सम्मानजनक जीवन जीना, लच्छीराम की कहानी हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा है. देश को ऐसे ही सच्चे सिपाहियों की जरूरत है, जो नायक भले ही न कहे जाएं, लेकिन असली हीरो वही हैं.



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