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‘हम नमाज अता करते थे…’, ईसाई सैन्य अधिकारी की बर्खास्तगी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर क्या बोले रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर्स?


रेजिमेंट के धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने से इनकार करने वाले भारतीय सेना के ईसाई अधिकारी को बर्खास्त किए जाने के फैसले को आर्मी के पूर्व अधिकारी और सेवारत अफसरों ने सही बताया है. उन्होंने कहा है कि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेंच ने अपने हालिया फैसले में सशस्त्र बलों के उस सिद्धांत को बरकरार रखा है, जिसके अनुसार सभी अफसर अपने सैनिकों के धर्म और अनुष्ठानों का सम्मान करते हैं. 

25 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में सेना के ईसाई अधिकारी सैमुअल कमलेसन की बर्खास्तगी को सही बताया था. कोर्ट ने कहा था कि कोई ऐसा व्यक्ति सेना में रहने के योग्य नहीं जो व्यक्तिगत आस्था के आधार पर रेजिमेंट के धर्मस्थल में जाने से मना कर दे. 

सैमुअल कमलेसन को थर्ड कैवेलरी रेजिमेंट में स्क्वाड्रन बी का ट्रूप लीडर बनाया गया जिसमें सिख और राजपूत सिपाही हैं. रेजिमेंट की व्यवस्था के मुताबिक हर हफ्ते सैमुअल कमलेसन को धार्मिक परेड का नेतृत्व करना था जिसमें सैनिक धर्मस्थल में जाते हैं. सैमुअल ने यह कहते हुए इस परेड में हिस्सा नहीं लिया कि रेजिमेंट में सिर्फ मंदिर और गुरुद्वारा हैं. ईसाई होने के नाते वह उनमें प्रवेश नहीं करेंगे. स्थानीय पादरियों के समझाने के बावजूद वह तैयार नहीं हुए, जिसके बाद उन्हें सेना ने बर्खास्त कर दिया. उन्होंने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन कोर्ट ने उनकी याचिका खारज कर दी.

दैनिक ट्रिब्यून में छपे एक लेख के अनुसार, सैन्य नेतृत्व के लिए अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने सैनिकों के मनोबल को व्यक्तिगत धार्मिक विवेक से ऊपर रखें. यही वजह है कि भारतीय सेना की परंपराएं इस सिद्धांत पर टिकी हैं- मेरा धर्म मेरे सैनिक का धर्म है. इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण फील्ड मार्शल मानेकशॉ का अपने सैनिकों की ओर से दिए गए उपनाम सैम बहादुर को स्वीकार करना है, जो गोरखा रेजिमेंट का हिस्सा होने का संकेत था. ऐसे भाव सांस्कृतिक एकता के प्रतीक हैं, न कि दबाव के.

द इकोनॉमिक्स टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे ने कहा, ‘हम सभी धर्मों के प्रति समान नजरिया रखते हैं और हमारा धर्म सेना है. हमारे लिए सैनिकों का धर्म ही हमारा धर्म है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हम अपने धर्म का पालने करने से वंचित हैं. ‘ उन्होंने कहा, ‘यह एक असाधारण मामला है. मैं अपने कई साथियों को जानता हूं जो अपने सैनिकों के साथ गुरुद्वारे जाते थे और बाद में चर्च या जिस भी धर्म का वे पालन करते थे, वहां जाते थे.’

डिफेंस एनालिस्ट लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर्ड) जेएस सोढ़ी ने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सही है. भारत की तीनों सेनाओं के दो मूल सिद्धांत हैं. एक सेना धर्मनिरपेक्ष है और दूसरा यह गैर राजनीतिक है. जब मैं सेना में था तो मेरी रेजिमेंट में 37 प्रतिशत सैनिक सिख थे, 37 प्रतिशत हिंदू महाराष्ट्र से आते थे और 18 प्रतिशत मुस्लिम और बाकी 8 प्रतिशत अन्य धर्मों से थे. मंगलवार के दिन हमारे लिए आरती करना अनिवार्य था और शुक्रवार को नमाज और गुरुवाणी में शरीक होते थे. रिटायरमेंट के 12 साल बाद भी सभी धर्मों के लिए मेरा यही व्यवहार है.’

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