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सुर्खियों में आया नैनी सेंट्रल जेल का फांसी घर… जानें क्यों है इतना खास?

सुर्खियों में आया नैनी सेंट्रल जेल का फांसी घर... जानें क्यों है इतना खास?

नैनी सेंट्रल जेल

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज की नैनी सेंट्रल जेल के अंदर बना ‘फांसी घर’ एक बार फिर चर्चा में है. माफिया अतीक अहमद के बेटे के बैरक में नकदी मिलने के बाद उसे अब नैनी जेल के फांसी घर में शिफ्ट किया गया है. खंडहर जैसा वीरान पड़ा यह हाई सिक्योरिटी सेल फांसी देने वाले बंदियों का आखिरी आशियाना होता था. इसी में फांसी देने के एक दिन पहले यहां बंदी को रखा जाता था और अगले दिन बंदी को फांसी दे दी जाती थी.

फांसी की सजा पर रोक के बाद अब यह हिस्सा कम ही इस्तेमाल होता है. वैसे इस हाई सिक्योरिटी बैरक में अहम कैदियों को रखा जाता है. कई बार ऐसे कैदी, जो साथियों पर हंगामा करते हैं, उन्हें यहां बंद किया जाता है.

आज से चालीस साल पहले हत्या के जुर्म में दो सगे भाइयों समेत तीन लोगों को एक साथ फांसी के फंदे पर लटकाया गया था. जेल रिकार्ड के मुताबिक इस फांसी घर में आखिरी बार 18 नवंबर 1989 में धारा 302 के तहत हत्या के जुर्म में दो सगे भाइयों बाबूलाल और अशर्फी पुत्र बंसू, श्रीकृष्ण पुत्र छेदालाल निवासी भवानीगढ़, शिवगढ़ रायबरेली को फांसी के फंदे पर लटकाया गया था. उसके बाद आज तक किसी को फांसी की सजा नहीं दी गई.

आजादी के पहले रोशन ठाकुर को हुई फांसी

नैनी सेंट्रल जेल में संघीय/राज्य सरकारों द्वारा ऐतिहासिक रूप से आजादी के बाद केवल 3 दोषियों को फांसी दी गई थी. वह भी 1989 में. लेकिन आजादी के पहले इसी फांसी घर में एक क्रांतिकारी को फांसी दी गई. नैनी सेंट्रल जेल में स्वतंत्रता से पहले केवल एक क्रांतिकारी को फांसी दी गई थी जो थे ठाकुर रोशन सिंह.

1927 में काकोरी कांड के मुकदमे में दोष सिद्ध होने पर, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र नाथ लाहिरी और रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई. जल्दी सुनवाई के बाद उन्हें अलग-अलग जेलों में रुखसत किया गया था. जहां राम प्रसाद बिस्मिल गोरखपुर में, अशफाक उल्ला फैज़ाबाद में, राजेंद्र लाहिरी गोंडा में और ठाकुर रोशन सिंह को नैनी जेल में ही 19 दिसंबर 1927 को फांसी दी गई थी.



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