उत्तर प्रदेशभारत

विभाजन का दर्द: खामोशी, डर और बेघर… एक मां जो 4 बच्चों को लेकर 78 साल पहले सहारनपुर आई और बनाई नई पहचान

1947 के बंटवारे के दौरान लाखों लोगों ने अपनी जान गंवाई और कई लोगों को अपने घरों से भागना पड़ा. भारत आए शरणार्थियों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा. जैसे की रहने के लिए जगह नहीं होना, खाने के लिए अनाज नहीं होना और बीमारियों का प्रकोप. भारत सरकार और विभिन्न संगठनों ने शरणार्थियों को बसाने के लिए कई प्रयास किए. शरणार्थियों ने अपने नए जीवन की शुरुआत की और धीरे-धीरे अपने पैरों पर खड़े हुए. उन्होंने अपने अनुभवों से सीखा और नए अवसरों का लाभ उठाया.

ऐसे ही कई परिवार हैं, जिनकी कहानियां संघर्ष से भरी हैं. उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के छाबड़ा परिवार की कहानी आज हम आपको बता रहे हैं कि कैसे वो बंटवारे के बाद पाकिस्तान से भारत आए, एक बूढ़ी दादी ने कैसे अपने तीन बेटों और एक बेटी को नई जगह पर पाला-पोसा और उन्हें क्या-क्या संघर्ष करने पड़े…

ये कहानी है सहारनपुर के नुमाइश कैंप इलाके के रहने वाले छाबड़ा परिवार की. 1947 के बंटवारे के बाद छाबड़ा परिवार को एक ही रात में घर, दुकान, खेत-बाड़ी सब छोड़ना पड़ा और उनकी विधवा दादी अपने चार मासूम बच्चों को लेकर डरी-सहमी भारत आईं. जिस समय ये परिवार भारत आया तो उनके पास कुछ नहीं था. आज छाबड़ा परिवार का नाम जाने-माने व्यापारियों में गिना जाता है.

Saharanpur News

लाहौर के शेखपुरा में रहता था छाबड़ा परिवार

राजू छाबड़ा बताते हैं कि उनकी दादी बसंत कौर 1947 के बंटवारे में पाकिस्तान के लाहौर में स्थित शेखपुरा से भारत आईं. अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ अपने चारों बच्चों को लेकर वृंदावन गईं. उस समय सभी की उम्र 2 से 10 वर्ष थी. वृंदावन से बसंत कौर कुछ अन्य शरणार्थियों के साथ यूपी के सहारनपुर पहुंचीं. जिस समय बसंत कौर अपने चार बच्चों को लेकर सहारनपुर आईं. उस समय उनके पास शिवाय कपड़ों के कुछ नहीं था.

दुकानों पर मजदूरी की, तांगा तक चलाया

चारों बच्चों की जिम्मेदारी, उनके पालन-पोषण की चिंता, उन्हें दिन रात सता रही थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और वो संघर्ष करती रहीं. बसंत कौर के पोते और शहर के प्रतिष्ठित व्यापारी राजू छाबड़ा बताते हैं कि उनकी ताया रामशरण, उनके पिता केवल कृष्ण और चाचा लक्ष्मण दास कुछ बड़े हुए तो उन्होंने मिलकर परिवार का बोझ अपने सिर ले लिया. राजू छाबड़ा ने बताया कि उनके ताया, चाचा और पिता ने दुकानों पर मजदूरी की. चाचा ने घोड़ा-तांगा भी चलाया, अखबार बांटकर अपना जीवन-यापन किया.

दादी परिवार को लेकर लाहौर से भारत आईं

राजू छाबड़ा बताते हैं कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के शेखपुरा में उनके दादा अवस्थी राम की परचून की दुकान थी. 1947 बंटवारे से पहले उनकी मौत हो गई थी. राजू ने बताया कि शेखपुरा पाकिस्तान का वह इलाका था, जहां पर सबसे ज्यादा मारकाट हुई थी. सबसे ज्यादा वहां के लोग ही भारत आए. इसमें उनकी दादी बसंत कौर भी शामिल थीं. राजू छाबड़ा बताते हैं कि उनके पिताजी केवल कृष्ण उन्हें अक्सर पाकिस्तान की अपनी कुछ यादें बताया करते थे. हालांकि जिस वक्त उनके पिता भारत आए थे, उस समय उनकी उम्र सिर्फ 10 साल थी.

Independence Day

10 साल की उम्र में उन्होंने पाकिस्तान के अंदर घटी घटनाओं को देखा था, जिसमें सबसे बड़ी घटना तो बंटवारे की त्रासदी थी, जिसमें कई लोगों ने अपनी जान गंवा दी थी. भारत आने के बाद धीरे-धीरे छाबड़ा परिवार आगे बढ़ता रहा. परिवार के लोगों ने जी तोड़ मेहनत की. आज छाबड़ा परिवार की गिनती अच्छे व्यापारियों में होती है. राजू छाबड़ा बताते हैं कि उनके ताया के चार बच्चे और उनके चाचा का एक बेटा है. सभी लोग अपना-अपना व्यापार कर रहे हैं.

सहारनपुर के बड़े व्यापारी हैं राजू छाबड़ा

राजू छाबड़ा का अपना लकड़ी फर्नीचर का बड़ा भी कारोबार है. इसके अलावा वो बड़े प्रोजेक्ट में भी कॉन्ट्रैक्टर का काम कर रहे हैं. परिवार में दो बेटे हैं वाशु और आशु, जो उनके साथ बिजनेस में हाथ बंटा रहे हैं. राजू छाबड़ा का कहना है कि जब बंटवारा हुआ तो मेरे पिता भी कम उम्र के थे, लेकिन बंटवारे के समय के हालात जब हम अपने बुजुर्गों के मुंह से सुना करते थे तो हमारी रूह कांप जाती थी.

Saharanpur Hindi News

राजू का ये भी कहना है कि उस वक्त हालात ऐसे थे कि एक रात में मेरी दादी को अपना सब कुछ छोड़ना पड़ा. घर, दुकान, खेत यहां तक कि बचपन की गली, दोस्तों की यादें भी वहीं छूट गईं. उस सफर में सिर्फ जान बचाने की चिंता थी, सामान से ज्यादा इंसान मायने रखता था. हमारी दादी पापा, ताया, चाचा को लेकर ट्रेन से आईं थी.

पता नहीं था परिवार जिंदा पहुंचेगा या…

जिस ट्रेन से वो लोग आए थे, उस ट्रेन में खामोशी और डर दोनों भरे थे. रास्ते में पता नहीं था कौन जिंदा पहुंचेगा और कौन मरा. यहां आकर न घर था, न जमीन, न कोई पहचान, सिर्फ दो हाथ और जीने की हिम्मत थी. दादी ने मजदूरी से शुरुआत की, पापा ने दिन-रात मेहनत करके हमें पढ़ाया-लिखाया और हमें इस काबिल बनाया कि आज हम अपने पांव पर खड़े हैं

“आज जो हम खड़े हैं, वो उनकी कड़ी मेहनत, त्याग और हौसले का नतीजा है. बंटवारा हमारे लिए सिर्फ इतिहास की तारीख नहीं, हमारे खून में बसी वो कहानी है, जो हमें हर दिन याद दिलाता है कि इंसान सबकुछ खोकर भी फिर से खड़ा हो सकता है.”

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button