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‘मुझे पिताजी की विरासत को..’ जब पंडित जसराज की एक ना सुनकर रो पड़े थे गुलाम अली खां

शास्त्रीय संगीत की दुनिया कुछ नाम ऐसे है जो फिके पड़ जाते है और कुछ नाम ऐसे है वक्त के साथ चमक और ज्यादा बढ़ जाती है. शास्त्रीय संगीत जगत के ‘मार्तण्ड’ पंडित जसराज भी ऐसा ही एक नाम है. उनकी भक्ति से भरी गायकी, अनोखी ‘जसरंगी’ शैली और आध्यात्मिक भजन आज भी लाखों दिलों को छूते हैं.

पंडित जसराज की कला और समर्पण ने शास्त्रीय संगीत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है. 28 जनवरी को संगीत के मार्तण्ड की जयंती है.ऐसे में आखिर हम इस मामले में पंडित जसराज और उस्ताद बड़े गुलाम अली खां की 1960 की वह मुलाकात कैसे भुल सकते है, उनकी वो मुलाकात आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसी. 

क्या था वो भावुक किस्सा

उन्होंने एक इंटरव्यू में अपना एक बेहद भावुक किस्सा सुनाया था, जिसमें महान गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खां उनकी वजह से रो पड़े थे. यह घटना साल 1960 की है, उन्होंने बताया था, “मैं साल 1960 में मुंबई गया था, मेरे साथ डॉक्टर मुकुंदलाल भी थे.

जब मैं मुंबई गया, तो बड़े गुलाम अली खां से मिलने भी गया, उनकी तबीयत कुछ ठीक नहीं थी. हम उनके पैर दबाने लगे और उनसे बात की, तो वे काफी खुश हो गए थे और अचानक से बोले, ‘मेरा शागिर्द बन जा.’ उन्होंने बताया, “खां साहब ने मुझसे अचानक से कहा, जो मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि इतने बड़े उस्ताद मुझे अपना शिष्य बनाने की बात करेंगे.

मैंने जवाब दिया, ‘चाचा जान, मैं आपसे गाना नहीं सीख सकता.’ यह सुनकर बड़े गुलाम अली खां को बेहद हैरत हुई और उन्होंने वजह भी पूछी तो मैंने बताया कि मुझे पिताजी की विरासत को आगे बढ़ाना है. यह सुनकर वह भावुक हो गए और उनकी आंखें भर आईं. उन्होंने कहा, अल्लाह तेरी हर मुराद पूरी करे.”

 

भावनीओं का सम्मान करते हुए कहा “ना”

जसराज ने बाद में बताया कि खां साहब का रोना उनकी भावनाओं की गहराई दिखाता था. वे इतने बड़े उस्ताद थे कि किसी को भी शिष्य बनाने की इच्छा रखना भी बड़ी बात थी. और उन्होंने बताया की पंडित जसराज पहले से ही अपने बड़े भाई पंडित मणिराम के शिष्य थे और मेवाती घराने की परंपरा निभा रहे थे. खास बात यह थी कि वह पिता की विरासत को आगे बढ़ाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने मना कर दिया, लेकिन यह इनकार सम्मान से भरा था.

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