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मंदिर या मकबरा… जिसको लेकर फतेहपुर में हुआ बवाल, उसका क्या इतिहास? पढ़ें दोनों पक्षों के दावे

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में मंदिर-मकबरे विवाद के मामले को लेकर आज तीसरे दिन भी विवादित स्थान पर भारी पुलिस बल तैनात है. मौके पर किसी को भी जाने की इजाजत नहीं दी जा रही है. यहां तक की अब मीडियाकर्मियों को भी नहीं जाने दिया जा रहा है. एसपी अनूप कुमार सिंह और डीएम रविंद्र सिंह हर पल की निगरानी खुद कर रहे हैं. विवादित स्थान के सभी रास्तों पर पुलिस का सख्त पहरा है. पुलिस-प्रशासन ने साफ कर दिया है कि किसी भी तरीके से कानून-व्यवस्था के साथ खिलवाड़ नहीं करने दिया जाएगा. इसके साथ सोशल मीडिया पर भी पुलिस-प्रशासन ने निगरानी रखनी शुरू कर दी है. उन लोगों को चिन्हित किया जा रहा है, जो किसी भी तरीके की भड़काऊ पोस्ट कर माहौल बिगाड़ने में जुटे हुए हैं.

हालांकि इन सबके बीच मन में एक सवाल उठ रहा है कि अगर ये मकबरा है तो ये कब बनाया गया, इसको किसने बनवाया, इसका क्या इतिहास है… वहीं अगर यह मंदिर है तो ये मंदिर कब बनाया गया… इन्हीं दोनों तथ्यों को खंगाला हमारी टीवी9 डिजिटल की टीम ने… पढ़ें महेश सिंह की ये खास रिपोर्ट…

फतेहपुर जिले में मकबरे एवं मंदिर के बहुचर्चित मामले को लेकर मुस्लिम एवं हिंदू पक्ष के द्वारा जो दावे किए जा रहे हैं, उसमें मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह ऐतिहासिक मकबरा है, जो राष्ट्रीय संपत्ति है, जबकि हिंदू पक्ष का कहना है कि इस पूरे मामले में 2012 के दौरान फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मंदिर की जमीन को मकबरे में तब्दील किया गया है.

मुस्लिम पक्ष का दावा

जिस स्थान को मंदिर बताया जा रहा है, वह ऐतिहासिक दस्तावेजों में ‘नवाब अब्दुस समद खान’ का मकबरा है, जहां उन्हें दफन किया गया था. यह तथ्य ‘फतेहपुर: ए गजेटियर’ (लेखक: एच.आर. नेविल, सन 1906, पृष्ठ 199200) में दर्ज है. यह गजेटियर यूनाइटेड प्रोविन्सेस ऑफ आगरा एंड अवध की आधिकारिक जिला गजेटियर का भाग है. इसके अलावा, ‘इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया’ (खंड 12, पृष्ठ 83, सन 1881) में भी इस मकबरे का उल्लेख मिलता है.

इतिहासकारों के अनुसार, अब्दुस समद खान मुगल साम्राज्य के एक वरिष्ठ सूबेदार और सैन्य अधिकारी थे, जिन्होंने कई मुगल बादशाहों की सेवा की थी. इतिहासकारों के अनुसार, खजुआ के युद्ध में औरंगजेब ने अपने भाई शुजा को हराने के बाद फतेहपुर में डेरा डाला था. इसी दौरान यह इलाका औरंगजेब के सैन्य छावनी के रूप में विकसित हुआ, बाद में अब्दुस समद को यहीं बसाया गया.

अब्दुस समद की 1699 में मृत्यु के बाद उसके बड़े बेटे अबू बकर ने यह मकबरा बनवाया, जिसमें अब्दुस समद और अबू बकर दोनों की मजार मौजूद है. जिस अबू नगर इलाके में यह मकबरा है, उसका नाम भी अबू बकर के नाम पर रखा गया. इतिहासकारों के अनुसार, उस समय फतेहपुर में केवल दो मोहल्ले थे अबू नगर और खेलदार. 1850 के सरकारी नक्शे में भी यही दो मोहल्ले दर्ज हैं, जबकि बाकी इलाका झील से घिरा था.

हिंदू पक्ष का दावा

  • लगभग 600 वर्षों से ये प्राचीन मंदिर है.
  • देश की आजादी के बाद 1970 तक शकुंतला मान सिंह के पास इस मंदिर और परिसर का मालिकाना हक रहा.
  • सन 1970 में शकुंतला मान सिंह ने इस गाटा संख्या- 753, जिसमें मंदिर स्थित है, उक्त गाटा को राम नरेश सिंह को बेच दिया.
    सन 2000 से 2011 के बीच राम नरेश सिंह के द्वारा मंदिर परिसर को छोड़कर उक्त गाटे संख्या की पूरी जमीन को प्लाटिंग करके बेच दिया गया.
  • आरोप है कि सन 2012 में वक्फ द्वारा बनाए गए फर्जी दस्तावेज दाखिल कर सपा के मुस्लिम नेताओं के दबाव में तत्कालीन उपजिलाधिकरी सदर द्वारा उक्त गाटा की जमीन को मकबरे के नाम पर दर्ज करवा दिया गया, जबकि उसके पूर्व मंदिर परिसर को छोड़कर सम्पूर्ण भूमि को राम नरेश सिंह बेच चुके थे, जिसमें लगभग 40 से 45 मकान बने हुए हैं.
  • आरोप है कि जैसे ही मकबरा धरोहर के नाम फर्जी दस्तावेज के आधार पर खतौनी में चढ़ाया गया, इसके बाद मुस्लिमों के द्वारा हिंदुओं को पूजा-अर्चना से मना किया जाने लगा और अराजकतत्वों के द्वारा हिंदुओं को डराया और धमकाया जाता रहा.
  • 2012 तक मंदिर में एक मौर्य समाज के पुजारी थे, जो सुबह-शाम मंदिर में पूजा-अर्चना करते चले आ रहे थे. मकबरा खतौनी में दर्ज होते ही उक्त पुजारी को मुस्लिमों के द्वारा मारपीट कर भगा दिया गया.

शहर काजी ने क्या कहा?

वहीं फतेहपुर शहर के काजी फरीद उद्दीन कादरी ने कहा कि फतेहपुर के अबू नगर में सदियों पुराना मकबरा है. इस मकबरे को नुकसान पहुंचाया गया. घटना में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए. ऐतिहासिक मकबरे की हिफाजत की जाए. किसी भी धार्मिक स्थान को इस तरह की कार्रवाई से बचाया जाए. वहीं सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसी घटनाएं न केवल सांप्रदायिक सद्भाव को नुकसान पहुंचाती हैं, बल्कि देश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को भी खतरे में डालती हैं.

स्थानीय नागरिकों का मानना है कि सरकार को कड़े उपाय करने चाहिए और एक संदेश भेजना चाहिए कि जो लोग कानून और व्यवस्था के साथ हस्तक्षेप करते हैं, उन्हें किसी भी मामले में छूट नहीं दी जाएगी. वहीं शहर काजी फरीद उद्दीन कादरी ने पुलिस-प्रशासन से मांग की कि गाटा संख्या 753 और 1159 को चिन्हित करके अलग किया जाए, जिससे यह विवाद हमेशा के लिए खत्म हो जाए.

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