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नाबालिग नहीं है हत्यारोपी…SC का आदेश- संगीन धाराओं में झेलना होगा मुकदमा

नाबालिग नहीं है हत्यारोपी...SC का आदेश- संगीन धाराओं में झेलना होगा मुकदमा

सुप्रीम कोर्ट.

उत्तर प्रदेश में हत्या के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को जूविनाइल घोषित करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की बेंच ने आरोपी पर बालिग के रूप में ट्रायल चलाने का निर्देश दिया है. बता दें कि आरोपी को किशोर न्याय बोर्ड ने तीन साल की सजा पूरी करने पर रिहा कर दिया था. वहीं सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को तीन हफ्ते के भीतर निचली अदालत में पेश होने का निर्देश दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी मामले में जमानत लेने के लिए स्वतंत्र होगा. कोर्ट ने आगे कहा कि आरोपी द्वारा पहले पढ़े गए स्कूल द्वारा जारी प्रमाण पत्र में उसकी जन्मतिथि 18 अप्रैल 1995 दर्ज है. लेकिन उत्तर प्रदेश पंचायत राज कानून 1947 के तहत बनाए गए परिवार रजिस्टर में उसका जन्म वर्ष 1991 दर्ज है.

नाबालिग घोषित करने का आदेश रद्द

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट और एक अधीनस्थ अदालत के उस आदेश को शुक्रवार को खारिज कर दिया, जिसमें हत्या के एक मामले में आरोपी को नाबालिग घोषित किया गया था. शीर्ष अदालत ने कहा कि 2011 में कथित अपराध के समय आरोपी बालिग था.

आरोपी को कोर्ट में पेश होने का आदेश

न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने संज्ञान लिया कि आरोपी को किशोर न्याय बोर्ड ने तीन साल पूरे होने पर रिहा कर दिया था और उसे तीन हफ्ते के भीतर अधीनस्थ अदालत में पेश होने का निर्देश दिया. पीठ ने कहा कि वह मामले में जमानत लेने के लिए स्वतंत्र होगा.

उम्र में बड़ी हेरफेर का मामला

पीठ ने कहा कि यद्यपि आरोपी ने जिस स्कूल में पहले पढ़ाई की है, उसके द्वारा जारी प्रमाण पत्र में उसकी जन्मतिथि 18 अप्रैल, 1995 दर्ज है, लेकिन उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 के तहत बनाए गए कुटुंब रजिस्टर में उसका जन्म वर्ष 1991 दर्ज है. उसने कहा कि 2012 की मतदाता सूची में उसकी आयु 1 जनवरी, 2012 को 22 वर्ष दर्शायी गई है.

सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला

शीर्ष अदालत ने अपीलकर्ता द्वारा दायर अपील पर अपना फैसला सुनाया, जिसकी शिकायत पर हत्या के मामले में प्राथमिकी दर्ज की गई थी, जिसमें हाईकोर्ट के मार्च 2016 के फैसले को चुनौती दी गई थी. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2000 के तहत आरोपी को किशोर घोषित करने के अधीनस्थ अदालत के आदेश को बरकरार रखा था.

बालिग की तरह चलेगा मुकदमा

पीठ ने कहा कि कैराना पुलिस थाने में दर्ज मामले में आरोपी पर बालिग की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है. पीठ ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह प्राथमिकता के आधार पर, जुलाई 2026 के अंत तक, मुकदमे की सुनवाई पूरी करे.



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