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चाची की कचौड़ी और पहलवान की लस्सी पर चला बुलडोजर, क्या धीरे-धीरे खत्म हो रहा बना’रस’?

उत्तर प्रदेश के बनारस में केशव पान, पहलवान लस्सी और चाची की कचौड़ी ऐसे नाम हैं, जिनकी ब्रांडिंग करने के लिए कोई बॉलीवुड स्टार नहीं आया, बल्कि शहर के लोगों ने इनकी ब्रांडिंग की. इन दुकानों के साथ शुरू हुए राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय ब्रांड का कहीं कोई अता पता नहीं. लेकिन इनकी ब्रांडिंग लगातार होती रही. लेकिन ये फेमस दुकानें अब नहीं रही. 17 जून की देर रात इनको हटा दिया गया. प्रशासन की तरफ से ये कहा गया कि शहर की ट्रैफिक के लिए लंका चौराहे पर करीब 40 दुकानें समस्या हैं. लहरतारा से भिखारीपुर होते हुए लंका चौराहे से विजया मॉल तक 9.5 किमी लंबी सड़क का चौड़ीकरण किया जाना है. सुगम ट्रैफ़िक के लिए इनको हटाना जरूरी है. इसके लिए बहुत पहले पैमाइश कर मुआवजा भी दे दिया गया है. मंगलवार की देर रात बुलडोजर से सभी दुकानों को हटा दिया गया और इस तरह से काशी में एक और विरासत इतिहास बन गई.

लंका चौराहे पर पहलवान लस्सी को 75 साल तो चाची की कचौड़ी की दुकान को सौ साल से भी ज्यादा हो गए थे. पहलवान लस्सी के प्रोपराटर मनोज यादव मंगलवार को सूनी आंखों से वो मंजर देखते रहें और सुबह जब उनसे बात करने की कोशिश की तो हाथ जोड़ लिए कि “अभी कुछ नही कह पाऊंगा”.

74 साल पुरानी दुकान को हटाया

सन 1950 में पन्ना सरदार ने पहलवान लस्सी की शुरुवात की थी. बनारस में तब लस्सी का मतलब ही होता था पहलवान लस्सी. बीएचयू के छात्र छात्राओं ने इसकी ब्रांडिंग शुरू की और फिर जो भी बनारस आता वो इसका जायका लेना नही भूलता. 2014 में जब नरेंद्र मोदी यहां से चुनाव लड़ने आए तब इस लस्सी की ब्रांडिंग भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंची. बॉलीवुड के स्टार अक्षय कुमार, मिथुन चक्रवर्ती, कॉमेडियन संजय मिश्रा, अनुराग कश्यप, राजेश खन्ना, राज बब्बर, सोनू निगम और शंकर महादेवन के अलावा भी कई स्टार यहां लस्सी का स्वाद चख चुकें है. इसके अलावा स्मृति ईरानी, धर्मेंद्र प्रधान, केशव प्रसाद मौर्य, बृजेश पाठक, अरुण जेटली सहित कई केंद्रीय मंत्री और राज्य मंत्री भी इस लस्सी के फैन हैं.

देश- विदेश में ब्रांडिंग

मनोज यादव बताते हैं कि दुकान ऐसी फेमस हुई कि संकट मोचन संगीत समारोह में आए पद्मश्री से लेकर पद्मविभूषण कलाकारों के लिए बीते 25 साल से पहलवान की लस्सी जाती है. वे अपनी प्रस्तुति से पहले लस्सी पीना पसंद करते हैं. डीएवी पीजी कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अनूप मिश्रा बताते हैं कि पन्ना सरदार ने जब दुकान शुरू की थी तो शुद्ध मलाई बिकती थी. विश्वविद्यालय के छात्र तब दूध-दही का सेवन करते थे. लस्सी मथने की कला भी तब गजब की होती थी. लंका चौराहे पर तब रामलीला का मंचन होता था और लीला करने वाले कलाकारों को कुल्हड़ में शुद्ध मलाई यहीं से दिया जाता था. जिस दुकान की ब्रांडिंग देश विदेश में हो उसके लिए भी ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण ही रहा कि कोई भी इसको टूटने से बचा नहीं पाया. वाराणसी के लोगों का कहना है कि प्रशासन चाहता तो पहलवान लस्सी रूपी इस विरासत को बचाया जा सकता था.

चाची की कचौड़ी की दुकान

चन्नी देवी किसी की भी चाची थीं, जो अपना घर चलाने के लिए कचौड़ी सब्जी की अपनी इस दुकान में बैठना शुरू कीं. लेकिन उनके व्यवहार ने उनको सबकी चाची बना दिया. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना से साल भर पहले 1915 में ये दुकान स्थापित हुई थी. चाची के सबसे छोटे बेटे कैलाश यादव चौथी पीढ़ी के हैं, जो ये दुकान अपने बेटे के साथ चला रहे हैं. यूं तो इस दुकान पर उड़द की स्टफिंग वाले कचौड़ी आलू सीताफल की सब्जी और कुरकुरे जलेबी मिलते हैं. चाची की दी जाने वाली गालियां इस दुकान को बाकी दुकानों से अलग करती थीं. कुछ तो चाची की गालियां ही सुनने के लिए कचौड़ी खाने आते थे. बीएचयू के पूर्व अध्यक्ष चंचल बताते हैं कि एक बार राजेश खन्ना को लेकर वो इस दुकान पर पहुंचे. उनको देखते ही चाची उनको गरियाने लगीं. जब राजेश खन्ना कचौड़ी-जलेबी खाकर उसके पैसे देने लगें तो चाची ने कहा कि तू हम्मे पइसा देखइबे धर आपन पइसा, तोहरे जइसन ढेर देखले हई. राजेश खन्ना अवाक रह गएं. लेकिन जब वहां से चलने लगे तो चाची ने अपने पास से दस रुपये दिए और कहा कि “हई ध ला हमार आशिर्बाद हौ “.

लोगों का छलका दर्द

संस्कृति कर्मी अमिताभ भट्टाचार्य ने कहा कि चाहे वो पहलवान लस्सी हो या फिर चाची कचौड़ी की दुकान. ये सहज भाव से कम पैसे में अपनापन के साथ बनारसी टेस्ट देने वाले केंद्र थे. तब दोनों दुकानों पर विद्यार्थियों के पास कम पैसे होने या ना होने पर भी लस्सी और कचौड़ी मिल जाती थी. पन्ना सरदार तब कहते थे कि “सुन बे, आज त हम मान जात हई लेकिन जब बन जइबे तब हिसाब कर दिहे ठीक हौ न” चाची की दुकान विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्र छात्राओं के लिए कैंपस के बाहर आत्मीय रिश्ता बनाने वाला एक केंद्र था. विश्वविद्यालय के छात्र छात्राओं ने उनको चाची कहना शुरू किया. उनकी गालियां बाहरी कान से सुनने पर गालियां थीं जबकि अंतर्मन से जो सुनते थे उनको पता था कि वो रिश्ता जोड़ने का उनका बहाना था. अमिताभ भट्टाचार्य कहते हैं कि बनारस में दादियां अपने पोतों को लाड में दोगलऊ कहकर बुलाती थीं. लेकिन आज जब सबकुछ विकास के पैमाने पर ही तय हो रहा है तो ये आत्मीय संबंध बनाने की कला और ये दुकाने लोगों को कितना समझ में आ पाएंगी कहना मुश्किल है.



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