ग्रीनलैंड में ऐसा क्या है कि वहां हर हाल में कब्जा चाहते हैं ट्रंप? रूस के पास पहुंचने की चाल या है कोई और वजह समझें

दुनिया के तमाम देशों में नई-नई जंग छेड़ने, वेनेजुएला जैसे देश पर कब्जा करने और क्यूबा-मेक्सिको-कोलंबिया को धमकी देने के बाद अब डोनाल्ड ट्रंप की नजर ग्रीनलैंड पर है. वो पहले भी अपनी मंशा जाहिर कर चुके हैं और कह चुके हैं कि ग्रीनलैंड अमेरिका की सुरक्षा के लिए जरूरी है और इसे अपने कब्जे में लेना ही होगा, लेकिन क्या सच में ग्रीनलैंड अमेरिका की सुरक्षा के लिए इतना जरूरी है. क्या बात सिर्फ इतनी है कि अमेरिका को चीन और रूस से खुद को बचाने के लिए दुनिया के सबसे बड़े द्वीप ग्रीनलैंड को अपने कब्जे में लेना ही होगा या फिर असली वजह बर्फ से ढंकी ग्रीनलैंड की ज़मीन में दफ्न वो कीमती चीज है, जिस पर कब्जा किए बिना ट्रंप का मेक अमेरिका ग्रेट अगेन वाला सपना पूरा नहीं हो पाएगा.
दुनिया के नक्शे पर ग्रीनलैंड को देखें तो वो चारों तरफ से समंदर से घिरा हुआ दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, जो आर्कटिक और अटलांटिक महासागर के बीच में स्थित है. भौगोलिक तौर पर उत्तरी अमेरिकी महाद्वीप का हिस्सा है, लेकिन राजनीतिक और सांस्कृतिक तौर पर यूरोप के बेहद करीब, क्योंकि ये यूरोप का गेटवे है. इसका 80 फीसदी हिस्सा पूरी तरह से बर्फ से ढंका हुआ. बची हुई 20 फीसदी ज़मीन पर आबादी जो सिर्फ करीब 56 हजार की है, लेकिन इससे भी जरूरी जानकारी ये कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है और यह आर्कटिक में जहां तक ग्रीनलैंड की सीमा है वह क्षेत्र रूस के बेहद करीब है.
अमेरिका की रूस के पास पहुंचने की चाल
ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति की वजह से अमेरिका के लिए ये द्वीप सामरिक तौर पर बेहद महत्वपू्र्ण है. लिहाजा बिना कब्जे के भी अमेरिका ने ग्रीनलैंड में पिटुफ़िक स्पेस बेस बना रखा है, जो रूस की ओर से आने वाली किसी भी मिसाइल की पूर्व-चेतावनी देने वाले रडार सिस्टम का केंद्र है. साथ ही साथ ये स्पेस बेस आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों पर नजर रखने के लिए नेचुरल एयरक्राफ्ट कैरियर की तरह भी काम करता है. बाकी आइलैंड और ब्रिटेन के बीच का जो समुद्री गलियारा है GIUK Gap उसके जरिए रूसी नौसेना के जहाजों और पनडुब्बियों को अटलांटिक महासागर में जाने से रोकने के लिए भी अमेरिका को ग्रीनलैंड की जरूरत है. डोनाल्ड ट्रंप हमेशा इन्हीं सामरिक वजहों का हवाला देकर ग्रीनलैंड पर कब्जे की बात करते हैं.
ग्रीनलैंड की जमीन में दफ्न है कई कीमती चीज
हालांकि इस खेल के अलावा भी एक और बड़ा खेल है, जिसे ट्रंप खुलकर नहीं बताते हैं और वो है नियोडिमियम और डिस्प्रोयसियम. ये दोनों ही बेहद दुर्लभ खनिज पदार्थ हैं. इन्हें नया सोना या इंडस्ट्रियल विटामिन्स माना जाता है. सबसे पहले आपको नियोडिमियम के बारे में बताते हैं. नियोडिमियम से दुनिया का सबसे शक्तिशाली परमानेंट चुंबक बनाया जाता है, जो किसी भी इलेक्ट्रिक वीकल के मोटर में इस्तेमाल होता है ताकि कम वजन में वो अधिक पावर दे सके. मोबाइल फोन में लगे स्पीकर, वाइब्रेशन मोटर और बड़ी स्टोरेज क्षमता वाली छोटी-छोटी हार्ड डिस्क इसी नियोडिमियम से बनती है. विंड एनर्जी से लेकर मेडिकल सर्जरी और मिलिट्री गाइडेंस सिस्टम के लिए भी नियोडिमियम जरूरी चीज है. डिस्प्रोयसियम को नियोडिमियम के साथ मिलाकर इस्तेमाल किया जाता है.
नियोडिमियम चुंबक तो बना देता है, लेकिन उसका चुंबकत्व टेंपरेचर बढ़ने के बाद भी बना रहे, इसके लिए डिस्प्रोयसियम की जरूरत होती है. ऐसे में बिना डिस्प्रोयसियम के कार की मोटर बन ही नहीं सकती. न्यूक्लियर रिएक्टर बनाने से लेकर हाई इंटेंसिटी लैंप्स बनाने तक में डिस्प्रोयसियम का इस्तेमाल होता है और इन दोनों ही खनिजों पर चीन का एकाधिकार है. दुनिया में जितना भी डिस्प्रोयसियम और नियोडिमियम सप्लाई होता है उसका 80 से 90 फीसदी अकेले चीन के पास है. चीन समय-समय पर इसकी सप्लाई को रोकता रहता है, जिससे कभी मोबाइल फोन नहीं मिलते तो कभी गाड़ियां नहीं मिलतीं तो कभी मिसाइल गाइडेंस सिस्टम का प्रोडक्शन ठप हो जाता है. ये सब तभी तक ठीक-ठाक चलता है जब तक चीन चाहता है.
ग्रीनलैंडल पर कब्जा कर चीन पर यूएस की निर्भरता होगी खत्म
ग्रीनलैंड में भी इन दोनों ही खनिजों यानी कि डिस्प्रोयसियम और नियोडिमियम का भंडार होने का अनुमान जताया गया है. अमेरिका की असली मंशा इसी भंडार पर कब्जे की है ताकि वो चीन की डिस्प्रोयसियम और नियोडिमियम के प्रोडक्शन के मामले में मनमानी को रोक सके और दुनिया में अपनी बादशाहत कायम कर सके. बाकी कुछ और भी वजहे हैं ग्रीनलैंड पर कब्जे की. सबसे बड़ी वजह भविष्य का समुद्री व्यापारिक रास्ता है. अभी आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है, जिससे नए शिपिंग रूट्स खुल रहे हैं. अगर ये रास्ते पूरी तरह से बन गए तो पनामा और स्वेज नहर के मुकाबले एशिया और यूरोप के बीच की दूरी काफी कम हो जाएगी. ग्रीनलैंड पर अगर अमेरिकी नियंत्रण होता है तो भविष्य में इन रास्तों पर भी अमेरिका का ही दबदबा होगा.
यही कारण है कि ट्रंप जब दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के लिए चुनाव प्रचार में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे थे तो उन्होंने कहा था कि राष्ट्रपति बनने के बाद वो ग्रीनलैंड को खरीद लेंगे. ट्रंप का दावा है कि ग्रीनलैंड को अपनी अर्थव्यवस्था चलाने के लिए डेनमार्क पर निर्भर होना पड़ रहा है. हर साल डेनमार्क करीब 600 मिलियन डॉलर ग्रीनलैंड को देता है, जिससे ग्रीनलैंड अपना खर्च चलाता है. इसकी वजह से डेनमार्क पर बोझ पड़ता है और ये बोझ अमेरिका आसानी से उठा सकता है, लेकिन डेनमार्क ने कह दिया कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है तो ट्रंप अब उसपर मिलिट्री ऐक्शन के जरिए कब्जा करने की प्लानिंग कर रहे हैं.
NATO के टूटने का खतरा मंडराया
हालांकि ये इतना भी आसान नहीं है, क्योंकि ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है और डेनमार्क उसी नाटो का सदस्य है, जिसमें अमेरिका भी है. ट्रंप ने नाटो देशों के प्रति भी अपनी नजर टेढ़ी कर रखी है और साफ-साफ कह दिया है कि नाटो देशों को अपनी जिम्मेदारी खुद उठानी पड़ेगी और उन्हें अपनी जीडीपी का 5 फीसदी हिस्सा अपनी-अपनी सेना पर खर्च करना होगा ताकि अमेरिका पर दबाव कम हो. यानी कि जिस नाटो पर कभी अमेरिकी दबदबा हुआ करता था और अमेरिका भी नाटो देशों की खुलकर मदद करता था, वही नाटो देश अब अमेरिका के लिए बोझ हैं.
अगर इस बोझ को हल्का करने के लिए अमेरिका ग्रीनलैंड पर मिलिट्री ऐक्शन करता है तो नाटो के आर्टिकल 5 के मुताबिक ये मिलिट्री ऐक्शन पूरे नाटो समूह पर माना जाएगा. हालांकि जब नाटो का ये आर्टिकल तय हुआ था तो इसका मकसद रूस को नाटो देशों पर हमले से रोकना था, लेकिन अब जब अमेरिका ही हमला करने पर आमादा है तो नाटो तो खत्म होगा ही होगा, यूनाइटेड नेशंस भी खत्म हो जाएगा. वैसे भी वेनेजुएला पर हुए एक्शन के बाद यूनाइटेड नेशंस पर सवाल तो उठ ही रहे हैं कि क्या असल में भी कोई यूनाइडेट नेशंस है या फिर वो सिर्फ कागजों में ही सिमटा है.
अमेरिकी धमकी के खिलाफ पूरा यूरोप एकजुट
अमेरिकी धमकी के खिलाफ अभी पूरा यूरोप एकजुट है. यूरोप के सात देशों ने खुला ऐलान किया है कि ग्रीनलैंड को लेकर कोई समझौता नहीं होगा. इसमें फ्रांस के राष्ट्रपति मैंक्रों, जर्मनी के चांसलर मर्ज, इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी, पोलैंड के प्रधानमंत्री टस्क, स्पेन के प्रधानमंत्री सैनचेज, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री स्टॉर्मर और डेनमार्क के प्रधानमंत्री फ्रेडरस्केन का संयुक्त बयान शामिल हैं, जिसमें उन्होंने ग्रीनलैंड का भविष्य तय करने के लिए वहां के लोगों की इच्छा और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सहारा लिया जाएगा न कि अमेरिकी मनमानी को सहन किया जाएगा.
दुनिया के तमाम देशों की बातों को अनसुना करके अमेरिका ने वेनेजुएला में जो किया है, उससे डर इस बात का तो है ही कि यूरोप की बातों को भी नजरंदाज करके ट्रंप अपना मंसूबा जरूर पूरा करेंगे. अगर ट्रंप ऐसा करते हैं तो फिर वो रूस हो या चीन वो भी उन देशों पर कब्जे की होड़ में जुट जाएगा जहां पर उसकी पहले से नजर है. जैसे रूस की नजर यूक्रेन पर है तो चीन ताइवान पर कब्जे का बहाना खोजता है. ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जा इन दो महाशक्तियों को भी अपने-अपने हिसाब से दूसरे देशों पर कब्जा करने का मौका दे देगा और फिर दुनिया एक अंतहीन जंग में उलझ जाएगी, जिसे कोई भी कभी भी किसी भी कीमत पर नहीं चाहता होगा.



