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अरबपति बनना चाहता था लेखपाल, औने-पौने रेट पर खरीदी दो गांवों की जमीन… होशियारीपड़गईभारी, 9 साल की प्लानिंग पर ऐसे फिरा पानी

अरबपति बनना चाहता था लेखपाल, औने-पौने रेट पर खरीदी दो गांवों की जमीन... होशियारीपड़गईभारी, 9 साल की प्लानिंग पर ऐसे फिरा पानी

आलोक दुबे.

वो कहते हैं ना कि ज्यादा होशियारी कभी-कभी भारी भी पड़ जाती है. ठीक ऐसा ही हुआ उत्तर प्रदेश के एक लेखपाल के साथ. कानपुर के रहने वाले एक लेखपाल ने पैसा चार गुना बनाने के चक्कर में ऐसा खेल खेला कि वो रडार पर आ गया. उसने साल 2016 में औने-पौने दाम पर दो गांव की जमीनें खरीदी. दरअसल, उसे पता चला था कि यहां से एक रिंग रोड बनने जा रहा है. इस कारण जमीन की कीमतें आसमान छू लेंगी.

लेखपाल ने कुल 41 संपत्तियां खरीद लीं. 29 संपत्ति उसके खुद के नाम पर थीं. बाकी की संपत्ति पत्नी और बच्चों के नाम पर थी. एक प्रॉपर्टी बिकी तो लेखपाल को 4 गुना फायदा हुआ. लेखपाल को लगा अब तो उसकी निकल पड़ी. यानि बाकी की प्रॉपर्टी से भी वो अरबपति को बन ही जाएगा. मगर ऐसा हुआ नहीं. लेखपाल की 9 साल की प्लानिंग का राज सबके सामने खुल गया.

बताया जा रहा है कि लेखपाल का नाम आलोक दुबे है. आलोक पहले कानूनगो था. लेकिन बाद में उसे डिमोट करके लेखपाल बना दिया गया. उसने रिंग रोड के जमीन अधिग्रहण में जमकर खेल किया. रिंग रोड निर्माण के प्रस्तावित रूट की जानकारी पहले होने पर लेखपाल ने अधिग्रहित दूल और रौतेपुर गांव में अपने और परिवार के नाम पर करोड़ों की जमीन खरीदी.

अधिग्रहण में उसकी सिर्फ एक संपत्ति ही अधिग्रहित की गई. जिसका उसने एक करोड़ का मुआवजा भू-अध्याप्ति कार्यालय से उठाया है. ऐसे में रिंग रोड और न्यू कानपुर सिटी समेत कई परियोजनाओं का 450 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण और बांटा गया 1250 करोड़ का मुआवजा शक के दायरे में है.

ज्यादातर संपत्ति आलोक ने दूल और रौतेपुर गांव में खरीदीं. ये दोनों ही गांव रिंग रोड के प्रस्तावित रूट पर है. सभी खरीदी फरोख्त 2016 के बाद से ही शुरू की गई. इससे स्पष्ट है कि लेखपाल आलोक दूबे को रिंग रोड के प्रस्तावित रूट की जानकारी थी. इसलिए उसने औने-पौने दामों पर जमीन को खरीदा. हालांकि, अधिग्रहण में उसकी सिर्फ एक ही जमीन आई. जिसका उसने अधिग्रहण के दौरान चार गुना मुआवजा उठाया.

आय से अधिक संपत्ति का मामला

इसके बावजूद आला अफसर पूरे मामले को दबाए रहे. लेखपाल की इस करतूत से रिंग रोड, न्यू कानपुर सिटी समेत अन्य जमीन अधिग्रहण पर सवालियां निशान उठा रहे हैं. लेखपाल आलोक दुबे अब पूरी तरह से फंस चुका है. जिला प्रशासन की संस्तुति पर उसके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति की जांच शुरू हो गई है. विजिलेंस की गुप्त जांच चल रही है. उस पर जल्द बड़ी कार्रवाई हो सकती है. इसके लिए लेखपाल से सवाल जवाब किया जा चुका है. अब उसकी एक-एक संपत्तियों की जांच होगी.

कैसे फंसा आलोक दुबे?

जानकारी के अनुसार, आलोक के खिलाफ संदीप सिंह नामक व्यक्ति की शिकायत पर गठित जांच समिति में एडीएम (न्यायिक), एसडीएम सदर और एसीपी कोतवाली शामिल थे. जांच में पाया गया कि सिंहपुर कठार की गाटा संख्या 207 और रामपुर भीमसेन की गाटा संख्या 895 की जमीनें न्यायालय में विचाराधीन थीं. इन पर न तो विक्रेता का नाम खतौनी में था और न ही बिक्री की वैधानिक अनुमति. फिर भी 11 मार्च 2024 को वरासत दर्ज कर उसी दिन बैनामा कर दिया गया. इसके बाद गाटा 207 को 19 अक्टूबर 2024 को RNG इंफ्रा नाम की निजी कंपनी को बेच दिया गया. बस यही एक गलती आलोक दुबे के लिए गले की फांस बन गई.

SDM स्तर पर चल रही कार्रवाई

जांच में सामने आया कि यह पूरा मामला पद का दुरुपयोग, मिलीभगत और हितों के टकराव का है. इस मामले में थाना कोतवाली में मार्च 2025 को एफआईआर भी दर्ज की गई थी. विभागीय जांच निलंबन के साथ शुरू हुई और चार आरोपों वाला आरोपपत्र मार्च 2025 को जारी किया गया. अगस्त 2025 को आरोपी की व्यक्तिगत सुनवाई हुई. जांच अधिकारी ने पाया कि आलोक दुबे ने विवादित भूमि का अनुचित तरीके से बैनामा किया, लगातार बिना अनुमति संपत्ति खरीद-फरोख्त में शामिल रहे और सरकारी आचरण नियमों का उल्लंघन किया. आलोक दुबे के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया एसडीएम सदर स्तर पर चल रही है. जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि राजस्व प्रणाली में किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी, अभिलेखों में छेड़छाड़ या साठगांठ करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी.

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